अरविंदर सिंह,हमीरपुर(TSN): आज के समय में जहां जिंदगी के अंतिम पड़ाव में अपने साथ छोड देते है वहीं हमीरपुर में एक ऐसा शख्स है जो लावारिश लाशों को अपने कंधों पर ढोकर न केवल उनका अंतिम संस्कार करवाता है बल्कि अपने खर्चें पर हरिद्वार में जाकर अस्थियां को भी गंगा में पूरे रिति रिवाज से बहाता हैं। जी हां हमीरपुर के समाज सेवी शांतनु कुमार की ओर से करीब दो दशकों से मिशन लावारिश के तहत कुछ ऐसा ही काम किया जा रहा है जिसके चलते अब तक शांतनु 3033 लावारिश शवों का अंतिम संस्कार की सारी क्रियाएं करवा चुके हैं।
श्राद्वों में अब हरिद्वार में समाजसेवी शांतनु की ओर से 3033 लोगों की आत्मा की शांति के लिए विधिवत पूजा अर्चना करवा करवाई गई हैं और समाज सेवी शांतनु कुमार सभी लावारिस लोगों का हरिद्वार में अपने खर्चे पर श्राद्ध भी किया हैं।
हमीरपुर के निवासी शांतनु कुमार को समाज सेवा के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के एवज में गार्ड फेयर ब्रेबरी अवार्ड से भी तत्कालीन राज्यपाल सदाशिव कोकजे की ओर से सम्मानित किया गया हैं, तो वर्ष 2012 में हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से उन्हें हिमाचल गौरव अवार्ड से नवाजा जा चुका हैं। हमीरपुर बाजार में एक छोटे से खोखा में कपड़े की दुकान लगाने वाले शांतनु कुमार ने इनाम में मिली हजारों रूपये की राशि को भी अपने पास नहीं रखा और उसे भी चैरिटी में दान कर दिया।
शांतनु का कहना है कि समाज सेवा करके अलग सी अनुभूति होती है और इस काम के लिए वह मदर टेरेसा को प्रेरणा स्त्रोत मानते हैं। समाज सेवी शांतनु कुमार समाज सेवा में किसी भी चीज को आडे नहीं आने देते है और इसीलिए उन्होंने निर्णय लिया है कि वह आजीवन कुंवारे रहेंगे।
उनका कहना है कि गत बीस सालों से मिशन लावारिश के तहत लावारिश शवों के अंतिम संस्कार के बाद श्राद्ध भी करवाया जाता रहा हैं। अभी हाल ही में वे हरिद्वार में श्राद्ध करवा कर वापिस लौटे हैं। उनका कहना है कि लावारिश शवों के अंतिम संस्कार से लेकर हरिद्वार में अस्थियां विसर्जित करने के लिए खुद ही खर्चा उठाते है और सरकार से भी कोई मदद नहीं मिलती हैं।
उनका कहना है कि संसार में हर आदमी लावारिश ही है और शिनाख्त न होेने पर लावारिश हो जाता हैं। उन्होंने कहा कि मन में विचार आने के बाद ही लावारिश शवों के अंतिम संस्कार के लिएउन्होंने काम करना शुरू किया। उनका कहना है कि किसी समय में लोग लावारिश शवों के अंतिम संस्कार करते देख कर मजाक बनाते थे लेकिन आज हजारों लावारिश शवों का अंतिम संस्कार करवा चुके है और ऐसा करने से खुशी होती हैं। उन्होंने कहा कि इस सब का खर्चा वह खुद ही बहन करते हैं और यहां तक की हरिद्वार जाकर अस्थियां बहाने का खर्च विवाह खुद करते हैं हालांकि उन्होंने इस कार्य के लिए सरकार से हरिद्वार जाने के लिए फ्री बस पास दी जाने की मांग की थी लेकिन यह मांग नहीं मानी गई हैं।
बता दें कि समाज सेवा का जब्बा मन में पाले हुए शांतनु आज के समय में हर किसी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बने हुए है और जब भी उन्हें पता चलता है कि कहीं पर लावारिश शव पड़ा होता है तो वह अपने मकसद के लिए निकल पड़ते है और शव का अंतिम संस्कार करवाने के अलावा हरिद्वार में अस्थियां तक विसर्जन करके ही वापिस लौटते हैं। हर साल हरिद्वार में विधिवत पूजा अर्चना के साथ श्राद्ध भी संपन्न करवाते हैं।
