धर्मशाला,राहुल-:हिमाचल प्रदेश के मैक्लोडगंज स्थित दलाई लामा मंदिर परिसर में बुधवार को तिब्बती लोकतंत्र दिवस की 66वीं वर्षगांठ धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर निर्वासित तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री पेनपा त्सेरिंग, तिब्बती संसद के सांसदों, मंत्रियों और बड़ी संख्या में तिब्बती समुदाय के लोगों ने कार्यक्रम में भाग लिया। समारोह के दौरान तिब्बती लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकास और उसकी यात्रा को याद किया गया।
कार्यक्रम में तिब्बती भाषा, संस्कृति, धर्म और पहचान के संरक्षण को लेकर विशेष रूप से जोर दिया गया। निर्वासित तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री पेनपा त्सेरिंग ने चीन की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि तिब्बती क्षेत्रों में ऐसी नीतियां लागू की जा रही हैं, जिनसे भाषा, सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक परंपराओं और तिब्बती पहचान पर असर पड़ने की आशंका है।पेनपा त्सेरिंग ने एक जुलाई से लागू किए गए कथित ‘जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाले कानून’ को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने तिब्बती भाषा के संरक्षण, सांस्कृतिक समावेशन, तिब्बती बौद्ध धर्म के कथित सिनिकीकरण, निगरानी और क्षेत्रीय स्वायत्तता जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे तिब्बतियों से अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक विरासत को बचाने के लिए एकजुट होकर प्रयास करने का आह्वान किया।
वहीं, तिब्बती सांसद गोम्पो दोनडुप ने 2 सितंबर को तिब्बती समुदाय के लिए बेहद महत्वपूर्ण दिन बताया। उन्होंने कहा कि परम पावन दलाई लामा के नेतृत्व, मार्गदर्शन और आशीर्वाद से निर्वासित तिब्बत सरकार ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए।
गोम्पो दोनडुप के मुताबिक, वर्तमान में निर्वासित तिब्बत सरकार लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के आधार पर कार्य कर रही है। इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की उपलब्धियों और संघर्षों को याद करने के लिए हर वर्ष यह दिवस मनाया जाता है।समारोह के दौरान निर्वासित तिब्बत सरकार के सिक्योंग, तिब्बती संसद के स्पीकर और अन्य प्रतिनिधियों ने संबोधित किया। कार्यक्रम में तिब्बती स्कूली बच्चों ने रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी दीं।

