समारोह के दौरान हिमाचल प्रदेश के उन 52 वीर सैनिकों को पुष्पांजलि अर्पित की गई, जिन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी। इस अवसर पर पराशर संस्थान और स्थानीय सैन्य परिवारों की उपस्थिति ने श्रद्धांजलि को और अधिक भावपूर्ण बना दिया।कैप्टन संजय ने समारोह में पहुंचे कुल 832 सैनिकों, पूर्व सैनिकों और वीर नारियों को फूलमालाएं पहनाकर तथा स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। इस आयोजन में 1200 से अधिक लोगों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि देशभक्ति की भावना आज भी समाज में गहराई से जड़ें जमाए हुए है।
कैप्टन संजय ने अपने संबोधन में कहा कि वह प्रत्येक वर्ष कारगिल विजय दिवस पर ऐसे समारोह आयोजित करते हैं और यह परंपरा जीवन भर जारी रहेगी। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अतीत की प्रेरणा से ही एक सशक्त और स्वर्णिम भविष्य का निर्माण संभव है। कारगिल युद्ध को याद करते हुए उन्होंने बताया कि यह केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि राष्ट्र की एकता और संप्रभुता की परीक्षा भी थी।उन्होंने बताया कि कैसे भारतीय सेना ने विषम परिस्थितियों, दुर्गम भूगोल और दुश्मन की ऊँचाई पर स्थिति के बावजूद अद्वितीय साहस और अनुशासन के साथ विजय प्राप्त की। उन्होंने 1965 और 1971 के युद्धों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने हमेशा अपने शांतिप्रिय स्वभाव को बनाए रखा है, लेकिन जब-जब उसकी सीमाओं पर खतरा आया, तब-तब भारतीय सेना ने दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब दिया।
समारोह के विशेष अतिथि मेजर ओपी गुलिया (सेवानिवृत्त) ने भी पराशर संस्थान के इस प्रयास की सराहना की और कहा कि ऐसे आयोजन न केवल सैनिकों को सम्मानित करते हैं, बल्कि समाज में देशभक्ति और कृतज्ञता की भावना भी जागृत करते हैं।कार्यक्रम में जसवां-प्रागपुर, देहरा, ज्वालामुखी, कांगड़ा और बिलासपुर से बड़ी संख्या में परिवारों ने भाग लिया, जिससे यह आयोजन एक प्रेरणादायक राष्ट्रभक्ति उत्सव में परिवर्तित हो गया।
