चन्द्रिका – देवभूमि हिमाचल में धार्मिक स्थलो में से एक मणिकर्ण हिंदू व सिख लोगों की आस्था का स्थल है। कुल्लू जिले के पार्वती घाटी में ब्यास और पार्वती नदियों के मध्य ये तीर्थस्थल लोगों की आस्था का केन्द्र है, जहां देशभर से लोग यहां पहुंचते हैं।
ऐसे पड़ा यहां का नाम मणिकर्ण
हिंदू मान्यताओं के अनुसार यहां का नाम इस घाटी में देवी पार्वती के कान (कर्ण) की बाली (मणि) खो जाने से संबंधित है। भगवान शिव और देवी पार्वती इस स्थान की सुंदरता पर मोहित हो गए और उन्होंने 1100 सालों तक यहां रह कर तपस्या की थी। मां पार्वती जब नहा रही थीं, तब उनके कानों की बाली में से एक मणि पानी में जा गिरी। भगवान शिव ने अपने गणों से मणि ढूंढने को कहा लेकिन वह नहीं मिली। इससे भगवान शिव नाराज हो गए और उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया, जिससे माता नैनादेवी नामक शक्ति उत्पन्न हुई। माता नैना देवी ने भगवान शिव को बताया कि उनकी मणि पाताल में शेषनाग के पास है। देवताओं द्वारा प्रार्थना करने पर शेषनाग ने मणि वापस कर दी लेकिन वह इतने नाराज हुए कि उन्होंने जोर की फुंकार भरी जिससे इस जगह पर गर्म जल की धारा फूट पड़ी। तभी से इस जगह का नाम मणिकर्ण पड़ गया।
गुरुद्वारा मणिकर्ण साहिब गुरु नानक देव जी की यहां की यात्रा की स्मृति में बना
मणिकर्ण सिख धर्म का भी प्रतीक माना जाता है। गुरुद्वारा मणिकर्ण साहिब गुरु नानक देव जी की यहां की यात्रा की स्मृति में बना है। कहा जाता है कि यह पहली जगह है, जहां गुरु नानक देव जी ने ध्यान लगाया था और बड़े-बड़े चमत्कार किए थे। उनके शिष्य मर्दाना को भूख लगी थी लेकिन भोजन नहीं था। इसलिए गुरु नानक जी ने उसको लंगर के लिए भोजन एकत्र करने के लिए भेजा। लोगों ने रोटियां बनाने के लिए आटा दान में दिया। सामग्री होने के बावजूद वे आग न होने के कारण भोजन पकाने में असमर्थ थे। इसके बाद गुरु नानक देव जी ने मर्दाना को एक पत्थर उठाने के लिए कहा और ऐसा करते ही वहां से गर्म पानी का एक चश्मा निकल आया। इसी चश्मेे के उबलते पानी का इस्तेमाल आज भी गुरुद्वारा में रोटी, चावल, दाल आदि पकाने के लिए किया जाता है।
मणिकर्ण गर्म पानी के चश्मे के लिए भी जाना जाता
प्रकृति की गौद में बसा मणिकर्ण गर्म पानी के चश्मे के लिए भी जाना जाता है। इस पानी मे नहाने से विशेष रूप चर्म रोग या गठिया जैसे रोगों से राहत मिलती है। बताया जाता है कि यहां उपलब्ध गंधकयुक्त गर्म पानी में कुछ दिन स्नान करने से ये बीमारियां ठीक हो जाती हैं। यहीं नहीं यहां खौलते पानी मे लंगर के लिए भोजन भी पकाया जाता है। यहां सफेद कपड़े की पोटलियों में चावल डालकर चश्मों में उबालकर बनाए जाते हैं। मणिकर्ण में मंदिर व गुरुद्वारे के विशाल भवनों से लगती हुई पार्वती नदी बहती है। नदी का पानी बर्फ के समान ठंडा है, जिसके दाहिनी ओर गर्म व उबलते पानी के चश्मे हैं।
