अनिल कुमार,किन्नौर: हिमाचल प्रदेश अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ ही अपनी वेशभूषा और देव संस्कृति को लेकर विश्वभर में अपनी एक अलग पहचान रखता हैं। यहां हर एक जिला की अपनी एक अलग वेशभूषा,बोली और संस्कृति हैं जो देव भूमि हिमाचल को अन्य राज्यों से भिन्न बनाती है वही बात अगर हिमाचल के जनजातीय जिला किन्नौर की की जाए तो किन्नौर जहां अपनी वेशभूषा के लिए अपनी एक अलग पहचान रखता है तो वहीं यहां की देव संस्कृति भी बेहद ख़ास हैं। किन्नौर जिला में आज भी स्थानीय लोग बरसों पुरानी देव परंपराओं का निर्वहन पूरी निष्ठा और श्रद्धा भाव से कर रहे हैं।
इन्हीं में शामिल हैं किन्नौर तिरूङ घाटी के ठंगी गांव में गांव के देवता और स्थानीय लोगों की ओर से गांव की सुरक्षा के लिए की जाने वाली पूरी गांव की परिक्रमा। मंगलवार को किन्नौर के तिरूङ घाटी के ठंगी गांव में साङस कोर बुम कोर (तथागत गौतम बुद्ध के प्रवचनों को लिपिबद्ध किए गए ग्रन्थों की गांव में परिक्रमा) करने के साथ ही जगह- जगह साङस लगा कर (शुद्धिकरण) किया गया । इस परिक्रमा में स्थानीय देवता रापुक शंकर ओर गांव के बौद्ध भिक्षुगण व समस्त गांववासियों ने बढ़चढ़कर कर भाग लिया।
इस परिक्रमा मे ग्रामीणों को सुरक्षित रखते हुए देवता रापुक शांकरस सबसे पहले आगे चले और फिर बौद्ध भिक्षु व अंत में गांव के ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में परिक्रमा करते है और बौद्ध मंत्रो का जाप करते हैं। इस परिक्रमा का मकसद गांव की सुख समृद्धि व वर्षभर के अच्छी फसलों के लिए होता हैं।
बता दें कि भारत के हिमालयीय क्षेत्र जैसे लद्दाख, किन्नौर, लाहौल-स्पीति, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम इत्यादि प्रांतों में प्रतिवर्ष बौद्ध मंदिर में विराजित कांग्युर और तांग्युर (संस्कृत से भोटी भाषा में अनुदित बुद्धवचनों) पोथियों को संपूर्ण गांव में परिक्रमा करने के लिए निकाला जाता हैं। ऐसे करने के पीछे यह मान्यता है कि चूंकि इन पोथियों में तथागत बुद्ध के सम्यक वाणी को लिपिबद्ध किया गया है, इसलिए इन बुद्ध वचनों को पूरे गांव में परिक्रमा करने पर बुद्ध की मंगल वाणी का जीवंत रूप में अनुभव होता है ओर गांव की सुख-समृद्धि, खुशहाली और मंगल-मैत्री का संचार होता हैं। यह बौद्धधर्म और आदिम संस्कृति का एक ऐसा सुंदर विलयन है जो किन्नौर में सदियों से अनवरत चलता आ रहा हैं। यह संस्कृति वास्तव में अदभुत और महान कल्याणकारी हैं।
वर्ष भर की भविष्यवाणी करते हैं देवता
गांव की पूरी परिक्रमा के बाद स्थानीय देवता ग्रामीणों को आशीर्वाद प्रदान करने के अलावा वर्षभर की भविष्यवाणी भी करते हैं। बौद्ध धर्म के भिक्षु गण मंत्र जाप कर स्थानीय देवता की पूजा अर्चना भी करते है. जिसे स्थानीय बोली मे शु पजाम भी कहा जाता हैं।
