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हथकरघा से जुड़े कारीगरों को मशीन मेड की प्रतिस्पर्धा करना हुआ मुश्किल….सरकार से ये मांग

Chandrika
Chandrika 4 Min Read
Updated 2023/11/14 at 8:00 PM
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रामपुर बुशहर :कमल भारद्वाज (TSN)- आधुनिक मशीन मेड के आगे हथकरघा से जुड़े ग्रामीण कारीगरों को बाजार में प्रतिस्पर्धा करना काफी मुश्किल हो रहा है। अंतर्राष्ट्रीय लवी मेला मैदान में हथकरघा से जुड़े कारीगर जो हाथों से बने शॉल, पट्टू टोपी, दोहडू , कोट व अन्य वस्त्र लेकर आए हैं उन्हें हैंडमेड के आगे टिकना मुश्किल हो रहा है।

ग्रामीण दस्तकारी से जुड़े लोगों का कहना है कि वे लोग पहाड़ों के जंगलों में चरने वाले भेड़ों के ऊन से धागा तैयार करते है फिर बुनाई होती है उस के बाद शॉल, टोपी, पट्टू व विभिन्न वस्त्र बनाते है। यह उत्पाद पूर्ण रूप से जैविक होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होते है। हेंडमेड होने के कारण बनाने में काफी मेहनत लगती है। लेकिन वर्तमान में शहरों में मशीनों से बने सिंथेटिक हैंडलूम ने उनके व्यवसाय पर पानी फेरा है। इससे ग्रामीण स्वरोजगार को भी धक्का लग रहा है । क्योंकि हैंडमेड सस्ता व बुनाई में भी साफ होने के कारण ग्राहकों का भी आकर्षण का केंद्र बन रहा है। ऐसे में उन्हें ग्राहकों को हस्त निर्मित व मशीन मेड में फर्क को समझने में मुश्किल हो रहा है।

हस्त निर्मित उत्पादों को दी जाए तवज्जो

किन्नौर सांगला से ऊनी उत्पाद लेकर आई रेशमा ने बताया कि वे पिछले 14,15 सालों से लवी मेला लगा रहे है। उनका यह पुश्तैनी धंधा है। घरों में ऊनी वस्त्र बना करके लाते हैं । यह सारा काम हाथ से चाहे पट्टू ,पट्टी या टोपी बना कर लाते हैं। लेकिन मशीनों का जमाना आजकल आ गया है जो मिलावटी होने के कारण सस्ता होता है। लोग इसको समझ नहीं पाते ।

बागी कोटखाई से आए खरीददार भूषण रोच ने बताया कि पूरे परिवार के साथ लवी मेला मनाने आए है। यहां पर जो किन्नौरी मार्केट हैउसमें सारे जैविक एवं हैंडमेड है। पट्टू, शॉल, कोट ,पट्टी सभी ऑर्गेनिक है। मशीन में हालांकि फिनिशिंग अच्छी होती है,लेकिन महत्व मशीन मेड से हैंड मेड अच्छा है। यह एक पारंपरिक है और हमारी परंपरा है और हमारी लोगों का जो ग्रामीण दस्तकारों को प्रोत्साहित करने के लिए यह जरूरी है, ताकि लोगों को रोजगार मिले ।

हिमालय बौध वूमेंस गलीचा सोसाइटी मनाली के सचिव छेरिंग दोरजी ने बताया अपने हाथों से बने गलीचे यहां लाते हैं । कुछ तिब्बत से भी गलीचे लाए गए है। यह उनका पारंपरिक धंधा है। लेकिन अब पहले की अपेक्षा बहुत कम सामान बिक रहा है।इसका एक कारण शहरों में बने मशीन में सिंथेटिक गलीचा है। लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होती की मशीन मेड और हैंड मेड में क्या अंतर है।

किन्नौर किल्बा से आई भाग देवी ने बताया कि वे पट्टू, पट्टी बनाते हैं ।वह भेड़ के ऊन को काट कर यह सब बनाते हैं और इसमें बहुत मेहनत लगता है। लेकिन जो मशीन में बाहर से उत्पाद आ रहे हैं वह सस्ते होने के साथ फिनिश वाले हैं। लेकिन हमारा जो नेचुरल और ऑर्गेनिक हाथों से बना होता है इसकी उपयोगिता अधिक रहती है ।

TAGGED: Rampur busher handloom artisans
Chandrika November 14, 2023
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