अनिल कुमार, किन्नौर: हिमाचल प्रदेश का जनजातीय जिला किन्नौर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जितना मशहूर हैं उतना ही मशहूर हैं यहां की ऐतिहासिकता के लिए। इसका ही एक उदाहरण हैं कि यहां के लोग आज के समय में भी सदियों से चली आ रही परंपराओं के साथ ही पुरानी चीजों का भी इस्तेमाल कर रहे है और उन्हें तवज्जों दे रहें हैं।
किन्नौर जिला में आज भी सैकड़ो वर्ष पूर्व सामान तोलने के लिए इस्तेमाल होने वाले तराजू का इस्तेमाल किया जाता हैं। सदियों पहले यहां ज़ब एक दूसरे व्यक्ति को सामान देना होता था या व्यापारी सामान को बेचते थे तो तराजू का किस्म बिल्कुल अलग थलग हुआ करता था। जिला के छितकुल गांव में आज भी इस तराजू का प्रयोग ग्रामीण करते है जिसे किन्नौर के अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नाम से जाना जाता हैं। कुछ क्षेत्रों में इसे बट्टी तकली,पोरे आदि कहा जाता हैं जिसमें खाद्य पदार्थों के अलावा अन्य सामानों को तोलने क़ा काम किया जाता हैं।
इस तराजू का ऊपरी हिस्सा लकड़ी, व निचला हिस्सा तरपाल, चमड़े आदि का बना होता हैं। इसमें लोहे का बट्टा ऊपरी तरफ फसाया जाता है जिसके बाद इसमें सामान (वस्तुओं ) को नाप तोलकर लोगों को दिया जाता था।
लुप्त होते इस तराजू के बाद आज आधुनिक तराजू दुकानों मे देखने को मिलते हैं बावजूद इसके भी बुजुर्गों की इस विरासत को आज भी छितकुल गांव के ग्रामीण मुकेश नेगी ने संभाल कर रखा है और आज भी वे इस सैकड़ो वर्ष पुराने तराजू क़ा प्रयोग कर रहे हैं। इस तराजू को देखने के लिए देश विदेश से लोग उनके पास आते है और पुरानी विरासत को देखकर पुराने दिनों के अनुभव महसूस करते हैं।
बता दे कि जिला में सैकड़ो वर्ष पुरानी तकनीक वाले इस तराजू से ही जिला के अंदर व्यापारिक दृष्टि से वजन इत्यादि को तोला जाता था और आज बदलते दौर के साथ किन्नौर में यह तराजू लुप्त हो रहा हैं9। यहां कुछ गिने चुने लोगों के पास ही यह तराजू देखने को मिलता हैं। यह तराजू किन्नौर के अच्छे व्यापरियों जो तिब्बत से व्यापार करते थे उनके पास हमेशा उपलब्ध रहता था।
