चन्द्रिका- हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के बगलामुखी मंदिर में देशभर से श्रद्धालु आते हैं,ये मंदिर शत्रुओं पर विजय की प्राप्ति के लिए जाना जाता है। यहां लोग दूर-दूर हवन करवाने आते हैं, ताकि उनके शत्रुओं का नाश हो सके। हवन के लिए बाकायदा बुकिंग करवानी पड़ती है ।
यहां पांडवो ने युद्ध मे विजय प्राप्त करने के लिए की थी विशेष पूजा
कांगड़ा जिला के रानीताल-देहरा सड़क के किनारे बनखंडी में स्थित सिद्धपीठ माता बगलामुखी मंदिर की द्वापर युग में पांडवों द्वारा अज्ञातवास के दौरान एक रात में ही स्थापना की गई थी । जिसमें सर्वप्रथम अर्जुन और भीम द्वारा युद्ध में शक्ति प्राप्त करने और माता बगलामुखी की कृपा पाने के लिए विशेष पूजा की थी। मंदिर के साथ प्राचीन शिवालय में आदमकद शिवलिंग स्थापित है, जहां लोग माता के दर्शन के उपरांत अभिषेक करते हैं। मंदिर के साथ प्राचीन शिवालय में आदमकद शिवलिंग स्थापित है, जहां लोग माता के दर्शन के उपरांत अभिषेक करते हैं।बगलामुखी अनुष्ठान में पीले रंग, पीले वस्त्र, पीले पुष्प, पीले पदार्थ, हल्दी की गांठ का विशेष महत्व है।
मां बगलामुखी को दस महाविद्याओं में आठवां स्थान
पौराणिक कथाओं में मां बगलामुखी को दस महाविद्याओं में आठवां स्थान प्राप्त है। मां की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा आराधना करने की बाद हुई थी। मान्यता है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का ग्रंथ एक राक्षस ने चुरा लिया और पाताल में छिप गया। उसे वरदान प्राप्त था कि पानी में मानव और देवता उसे नहीं मार सकते। ऐसे में ब्रह्मा ने मां भगवती का जाप किया। इससे बगलामुखी की उत्पत्ति हुई। मां ने बगुला का रूप धारण कर उस राक्षस का वध किया और बह्मा को उनका ग्रंथ लौटाया।
त्रेतायुग में मां बगलामुखी को रावण की ईष्ट देवी के रूप में भी पूजा जाता है
त्रेतायुग में मां बगलामुखी को रावण की ईष्ट देवी के रूप में भी पूजा जाता था। रावण ने शत्रुओं का नाश कर विजय प्राप्त करने के लिए मां की पूजा की। लंका विजय के दौरान जब इस बात का पता भगवान श्रीराम को लगा तो उन्होंने भी मां बगलामुखी की आराधना की थी। बगलामुखी का यह मंदिर महाभारत काल का माना जाता है। इस मंदिर की स्थापना द्वापर युग में पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान एक ही रात में की थी।
