चन्द्रिका- सोलन शहर में स्थित जटोली मंदिर एशिया का सबसे ऊंचा मन्दिर है। ये मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है। ये मंदिर दक्षिण द्रविड़ शैली में बना है जो अद्भुत है। मंदिर की विशेषता है, निर्माण में लगाए गए पत्थर। इन पत्थरों को छूने या थपथपाने से डमरू की आवाज आती है।
भगवान शिव ने इस स्थान पर किया था अल्प विश्राम
जटोली मंदिर के विषय में मान्यता है कि भगवान शिव ने इस स्थान पर अल्प विश्राम किया था। भगवान शिव अपनी यात्रा के दौरान इस स्थान पर आए थे और यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता से मोहित होकर कुछ दिनों तक रुके भी थे। वहीं 1950 के दशक में स्वामी कृष्णानन्द इस स्थान पर आए थे। कहा जाता है कि जटोली के लोग तब पानी की भीषण कमी से जूझ रहे थे। लोगों के इस संकट को दूर करने के लिए स्वामी कृष्णानन्द ने भगवान शिव की घोर तपस्या की और अपने त्रिशूल से प्रहार कर जमीन से पानी बाहर निकाला। तब से जटोली के लोगों को कभी पानी की कमी का सामना नहीं करना पड़ा। जटोली मंदिर के निर्माण की नींव भी स्वामी कृष्णानन्द ने ही रखी थी। वही 1974 में इस मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। मंदिर के निर्माण में कुल मिलाकर 39 वर्ष लगे थे। स्वामी कृष्णानन्द ने 1983 में समाधि ले ली थी। मंदिर के कोने में ही स्वामी कृष्णानन्द की एक गुफा है। इस गुफा में भी एक शिवलिंग स्थापित है।
मंदिर की ऊँचाई लगभग 111 फुट है। इस मंदिर में 11 फुट का एक स्वर्ण कलश चढ़ाया गया जिसके कारण मंदिर की कुल ऊँचाई 122 फुट हो गई है। यह उत्तर भारत का सबसे ऊँचा और विश्व के कुछ सबसे ऊँचे शिव मंदिर में से एक है। मंदिर के चारों तरफ भगवान शिव और माता पार्वती समेत विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्फटिक मणि से निर्मित शिवलिंग स्थापित किया गया है।
