भावना शर्मा: हिमाचल की ना केवल अपनी खूबसूरती यहां की देव संस्कृति और पहनावे को लेकर एक अलग पहचान रखता हैं बल्कि हिमाचल की कला की वजह से भी इसकी विश्व भर में एक अलग पहचान है वही बात अगर कांगड़ा शैली की हो जाए तो फिर यह तो सोने पर सुहागा वाली बात हो जाती हैं। वैसे तो कांगड़ा शैली का सफर 16 वीं शताब्दी से लेकर उन्हें से शताब्दी के उत्तरार्ध में माना जाता है लेकिन ये शैली आज भी उतनी ही प्रसिद्ध है जितनी किस शताब्दी पूर्व हुआ करती थी। आज भी इस शैली की अपनी एक अलग पहचान और अपना एक अलग जॉनर हैं। अगर इनके पति की बात की जाए तो इस शैली को लाने का श्रेय मुगल चित्रकारों को ही जाता है। इस शैली की अपनी एक अलग पहचान है जिसकी वजह है इस शैली के चित्रों में प्रकृति के समावेश के साथ ही धार्मिक समावेश होना।
कांगड़ा शैली में कलागत गुुणों के अलावा कांगड़ा कलम के कलाकारों ने अपने चित्रों में यहां के प्राकृतिक सौंदर्य, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, बिजली बादल, ऋतु-मौसम, वर्षा-फूहार, नदियों-पहाड़ों के अतिरिक्त नायक-नायिका प्रेम-प्रसंग, रूप-चित्र, गीत-गोविन्दा, भागवत पुराण, बिहारी सतसई, रसिकप्रिया, कविप्रिया, नल-दमयंती प्रणय कथा को बेहद की आकर्षक ढंग से उकेरा हैं। कांगड़ा कलम के चितेरों ने रामायण, महाभारत ओर राधा-कृष्ण की अठखेलियों को भी अत्यंत प्रभावी ढंग से चित्रित किया हैं। चित्रकला इतिहास में एक शैली में इतनी विशाल विविधता का अन्य कोई उदाहरण न होना ही कांगड़ा शैली को विशिष्ट चित्र शैली में शुमार करता हैं।
कांगड़ा कलम के उद्भव और विकास के संदर्भ में अनेकों मत होने के बावजूद कला विकास में हरिपुर गुलेर का नाम अग्रणी है। यहां राजा दलीप सिंह (1695-1730) ने मुगल साम्राज्य से निष्काषित चित्रकारों को शरण दी लेकिन राजा दलीप सिंह और विशन सिंह आदि राजाओं के जो रूप चित्र प्राप्त हुए हैं उनमें भी मुगल कला का प्रतिरूप झलकता हैं। हरिपुर-गुलेर के राजा गोवर्धन चंद (1744-73) का पहाड़ी चित्रकला से विशेष लगाव का प्रतिफल था कि उनके शासनकाल में मुगल साम्राज्य का पहचान खो चुके चित्रकारों को न केवल यहां आश्रय ही मिला बल्कि मुगल शैली ने इस अवधि में हिंदू परंपरागत साहित्य के अनुकूल ढलना भी आरंभ कर दिया हैं।
इस परंपरागत का निर्वहन राजा प्रकाश चंद (1773-90) ने भी किया लेकिन कालानंतर राजा प्रकाश चंद के राज्य के अंतिम दिनों में गुलेर की सत्ता क्षीण होने से चित्रकारों ने पड़ोसी राजा संसार चंद (1775-1823) के राज्य टीरा सुजानपुर का रूख करना आरंभ कर दिया था। इतिहासकारों का मानना है कि गुलेर शैली के शुरूआती दौर के चित्र पंडित सेओ व उनके पुत्र मानकू व नैनसुख ने बनाए थे। नैनसुख ने जम्मू के मियां बलदेव सिंह के लिए भी चित्र बनाए थे जबकि मानकू ने बसोहली राज्य में भी अपनी कला प्रतिभा का परचम फहराया था। गुलेर, बसोहली और जम्मू के सामूहिक प्रभावों के मिश्रण में जिस शैली का निर्माण हुआ,उसमें ही कांगड़ा शैली के स्वरूप का निर्धारण हुआ। कांगड़ा शैली में रंगों, आकृतियों, शुक्षमता के अलावा चित्रकारों की कल्पना शक्ति भी विशिष्ट स्थान रखती हैं जो अनेकेों चित्रों में स्पष्टतता से झलकती हैं । वहीं राजा प्रकाश चंद के राज्य काल में अनकों चित्रकारों ने टीरा सुजानपुर व चंबा की ओर रूख किया। चंबा के राजा राज सिंह (1764-94) के लिए गुलेर के चित्रकारों ने चित्र बनाए।
राजा संसार चंद ने कांगड़ा शैली को दिलवाई पहचान
संसार चंद का राज्य काल में यह कला इतिहास में स्वर्णिम युग की ओर मानी जा सकती है। इस काल में कांगड़ा शैली ने ऊंचाईयों के नए आयाम स्थापित किए। महाराजा संसार चंद (1775-1823) ने लगभग 1780 से इस शैली को संरक्षण देना आरंभ किया। संसार चंद की कलाप्रियता अतुलनीय रही। अपनी संस्कृति को इतिहास की पृष्ठभूमि पर अंकित करने के लिए उन्होंने कांगड़ा चित्रशैली को इस कदर उभारा कि यह शैली विश्वभर के कला जगत में अपना सुदृढ़ स्थान बनाकर भारतीय संस्कृति की समृद्ध पहचान बन गई। टीरा सुजानपुर कांगड़ा शैली की विशिष्टता प्रदान करने का मुख्य केंद्र रहा। हालांकि आलमपुर और नादौन में कांगड़ा शैली की अनेकों कलाकृतियां निर्मित हुई लेकिन इन सब के बीच यह सुखद आश्चर्य का विषय है कि अगर राजा संसार चंद पहाड़ी चित्रकला को आगे बढ़ाने का प्रयास न करते तो संभवत कांगड़ा शैली का कोई भी चित्र विश्व भर के संग्रहालयों में नज़र न आता। पहाड़ी कला के सबसे बड़े पोषक महाराज संसार चंद के कला प्रेम से यह संभव हुआ कि कांगड़ा चित्र शैली ने विश्वभर की कलाओं में गौरवपूर्ण ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया। हम इसे मात्र एक उपलब्धि न मानकर यूं परिभाषित कर सकते हैं कि पहाड़ी कला एक महान भारतीय कला है और इस कला के साथ महाराजा संसार चंद का नाम अभिन्न रूप से जुड़ा है। इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो संसार चंद को एक शासक के रूप में कोई खास सम्मान हासिल नहीं है लेकिन एक कला प्रेमी के रूप में वह अमर है। कला के विस्तार का इतना विशाल आंदोलन इतिहास के किसी पन्ने पर अंकित नहीं हैं।
4 अप्रैल 1905 को आए भूकंप में दफ़न हो कर रहे गए कांगड़ा शैली के उत्कृष्ट चित्र
कांगड़ा चित्र शैली महज कांगड़ा तक ही सीमित न रह कर भारतीय कला की आत्मा बन कर संपूर्ण विश्व में अपनी एक अलग पहचान रखती हैं। यह शैली केवल अपने युगधर्म से नहीं अपितु प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए सबसे श्रेष्ठ हैं। युग-युगांतर तक अपना वैभव, आकर्षण और अस्तित्व बनाए रखने में समर्थ कांगड़ा शैली जिस मुकाम पर पहुंची हैं, उस सफर में इसके साथी रहे खुशाला, सेओ नैनसुख, मानकू, कुशनलाल, बसिया, जोहारू, निक्का, रामलाल, कामा पुरखु आदि सैंकड़ों सिद्धहस्त निपुण चित्तेरों की तूलिका से स्पर्शित असंख्य चित्र 4 अप्रैल 1905 को आए भूकंप में जमींदोज हो गए। विंध्वस में नष्ट यह बहुमूल्य कलाकृतियां संभवतः मानव इतिहास के सबसे बड़ी कला निधि की क्षति थी।
