संजीव महाजन,नूरपुर : नूरपुर ब्लॉक के जाच्छ में क्षेत्रीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र में किसानों , बागवानों की आमदनी बढ़ने के लिए फसलों के साथ साथ गर्म क्षेत्रो में उन्नत किस्म के बागवानी, सब्जियां,फॉरेस्ट्री, औषधीय पौधे की दृष्टि पर काम कर रहा और किसानों और बागवानों को सस्ते दामों में इन्हें उपलब्ध करवा रहा हैं। इसके साथ ही बरसात के मौसम में उन्नत किस्म के फलदार पौधे, औषधीय पौधे के साथ विभिन्न प्रजातियों के ओर ऐसे पौधे जिससे किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सके उनको उपलब्ध करवा रहा हैं।
डॉ. विपिन गुलेरिया ने कहा कि क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र जाच्छ डॉ.यशवंत सिंह परमार आधुनिक बानिकी विश्वविद्यालय का एक क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र हैं। हमारे यहां अलग-अलग विभाग हैं जिसमें बागवानी, फॉरेस्ट्री ओर सब्जियां हैं। फॉरेस्ट्री की दृष्टि से हम यहां गर्म क्षेत्र में पाए जाने वाले जितने भी वनों संबंधित पेड़- पौधे है उन पर हम अनुसंधान करते हैं। हमारी इस केंद्र की हरड़ की विशेष प्रजातियों के लिए और लसूडे की उन्नत किस्मों के लिए जोकि लसूडा लगभग लुप्त होने की कगार में आ गया था उसकी बीज करण और लोगों की ओर से काटा जा रहा था हम ने उसको कंजर्व किया गया हैं।
इसी के तहत अब केंद्र ने पांच ऐसी किस्में विकसित की है जो किसानों को हम उपलब्ध करवा रहे हैं। हमने अलग-अलग जगहों में इसका निरीक्षण भी किया है और इन किस्मों से अब किसान अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं। जो जमीन हमारी कभी मरु भूमि या कम उपजाऊ लगती थी उसमें भी किसान काफी पैसा कमा रहे हैं। हमारे प्रतिवर्ष लासूडा के लगभग पांच हजार उन्नत किस्म के पौधें जो कि दूसरे या तीसरे साल ही फल देते हैं किसानों को सस्ते दामों पर विश्वविद्यालय की तरफ से उपलब्ध करवाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि समय रहते किसान बागवान हमसे जुड़ें तो वह हमसे जानकारी हासिल करके अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं ।
डॉ. अनमोल वशिष्ठ ने कहा कि उत्तराखंड हार्टिकल्चर यूनिवर्सिटी जो कि 2011 में बनी थी यह बटसार में है। वहः यहां पर निदेशक शोध के रूप में कार्यरत हैं यह यूनिवर्सिटी सोलन यूनिवर्सिटी की तर्ज पर बनाई गई थी। इसमें वानिकी, फॉरेस्ट्री ,बागवानी कृषि पर हम काम कर रहे हैं। इसके साथ ही मोटा अनाज पर काम कर रहे हैं। इस तरह की फसलें वहां बहुत होती हैं। हम यहां से कुछ जरम प्लाज्मा लेकर वहां टेस्ट करेंगे और वहां भी इस तरह के पौधों को शोध करेंगे।
हमारे वहां के किसान भी इस तरह के पौधों की रुचि रखते हैं हम भी चाहते हैं कि किसानों की आय को कैसे बढ़ाया जाए, कैसे दोगुना किया जाए। यहां जो हरड़, बेड़ा, आंवला के पौधे है जो दो तीन सालों में फल दे देते उन्हें वहां भी ले जाया जाएगा। इसी को लेकर हमने डॉ. विपिन गुलेरिया जो इन पर काफी समय से शोध कर रहे इनसे मीटिंग की है और अपने वहां भी यहां से कुछ पौधे ले जाकर उनपर काम कर रहे हैं और अपने वहां के किसानों को यह पौधे उपलब्ध करवा रहे हैं।
