Mandi, 17 December-:हिमालय की गोद में बसे हिमाचल प्रदेश के लिए भूकंप हमेशा से एक गंभीर चुनौती रहे हैं। अब इस खतरे को समझने और उससे पहले चेतावनी देने की दिशा में विज्ञान ने एक नया कदम बढ़ाया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) मिलकर एक महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम शुरू कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य भूकंप से पहले धरती में होने वाले सूक्ष्म बदलावों की पहचान कर सटीक पूर्वानुमान तैयार करना है।
यह परियोजना पारंपरिक भूकंपीय अध्ययनों से आगे जाकर अंतरिक्ष और ज़मीन आधारित तकनीकों का समन्वय करेगी। अब वैज्ञानिक केवल पुराने भूकंप रिकॉर्ड या सीमित ज़मीनी आंकड़ों पर निर्भर नहीं रहेंगे, बल्कि उपग्रहों से मिलने वाले उच्च-स्तरीय डेटा का उपयोग करेंगे। इस शोध में जीएनएसएस (GNSS) और इन-सार (In-SAR) जैसी आधुनिक सैटेलाइट तकनीकों को प्रमुखता दी जाएगी।
तकनीक से मिलेगी धरती की हर हलचल की जानकारी
जीएनएसएस तकनीक की मदद से टेक्टोनिक प्लेटों की मिलीमीटर स्तर की गति को भी मापा जा सकेगा। वहीं इन-सार तकनीक ज़मीन के नीचे मौजूद फॉल्ट लाइनों पर बढ़ते तनाव, भूमि धंसने या ऊपर उठने जैसी प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से दिखाएगी। इन दोनों तकनीकों से प्राप्त डेटा को जोड़कर वैज्ञानिक 6 या उससे अधिक तीव्रता वाले भूकंपों के संभावित क्षेत्रों और प्रभावों का आकलन करने वाला मॉडल विकसित करेंगे।
मंडी क्षेत्र बनेगा अध्ययन का केंद्र
करीब 36 महीनों तक चलने वाली इस परियोजना का प्रारंभिक फोकस मंडी और उसके आसपास के भूकंपीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर रहेगा। IIT मंडी के प्रोफेसर महेश रेड्डी के नेतृत्व में विशेषज्ञों की टीम यहां की मिट्टी, ढलानों, चट्टानों और भूगर्भीय संरचनाओं का गहन विश्लेषण करेगी। टीम में डॉ. डेरिक्स पी. शुक्ला और डॉ. धन्या जे. जैसे शोधकर्ता भी शामिल हैं, जो जटिल डेटा को व्यवहारिक वैज्ञानिक मॉडल में बदलेंगे।
क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?
हिमाचल प्रदेश का बड़ा हिस्सा भूकंपीय ज़ोन-4 और ज़ोन-5 में आता है, जहां बड़े भूकंप की आशंका अधिक रहती है। इस परियोजना से न केवल आपदा प्रबंधन एजेंसियों को जोखिम वाले इलाकों की पहले से जानकारी मिलेगी, बल्कि भूकंपरोधी निर्माण, सड़कें, बांध और अन्य बुनियादी ढांचे की योजना भी अधिक सुरक्षित तरीके से बनाई जा सकेगी। साथ ही, यह शोध रिमोट सेंसिंग और जियोइन्फॉर्मेटिक्स के क्षेत्र में नए विशेषज्ञ तैयार करने में भी सहायक होगा।विशेषज्ञों का मानना है कि मंडी से शुरू होकर यह अध्ययन भविष्य में हिमालयी क्षेत्र के अन्य संवेदनशील हिस्सों के लिए भी एक मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
