अनिल कुमार,किन्नौर: हिमाचल में हर जिला की अपनी अलग परंपरा रीति रिवाज हैं। वर्ष भर यहां अनेकों मेले मनाए जाते हैं। वहीं बात अगर हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर की की जाए तो जिला किन्नौर की परंपरा रीति रिवाज और यहां के मेले अपने आप में हैं अनोखे ओर अद्भुत इतिहास को समेटे हुए हैं। किन्नौर ज़िला अपनी इन्हीं परंपराओं के चलते मामले मे सबसे अधिक लोकप्रिय रहा हैं क्योंकि यहां देवी देवताओ के अलावा भगवान शिव का शीतकालीन निवास भी माना जाता हैं,ऐसे में किन्नौर ज़िला में अलग-अलग परंपराओं के तहत कई मेले मनाए जाते हैं।
इसी तरह का एक मेला “आठारो मेला” जो किन्नौर ज़िला के उन मंदिरों में मनाया जाता हैं जिन मंदिरों के किसी भी कार्यवाही के 18 वर्ष पूरा हो जाता हैं। उस मेले को आठारो मेला कहा जाता हैं। इस मेले में ग्रामीणों की एकजुटता, रिश्तेदारी सबसे अहम भूमिका रखती हैं और मेले मे गांव से संबंध रखने वाले सभी जाई यानि वह महिलाएं जिनकी शादी गांव से बाहर हुई होती है उन्हें मुख्य रूप से स्थानीय देवता की ओर स्व मेले मे बुलाया जाता है और गांव की सभी भांजे और भांजी के स्वागत भी ग्रामीणों की ओर से किया जाता हैं।
बरी गांव में आयोजित आठारो मेले मे स्थानीय देवता काली नागेस मंदिर प्रांगण मे निकलकर सभी को आशीर्वाद प्रदान करने के साथ साथ जाई जोनती व भांजे भांजियों को भोज भी देते हैं। इस मेले मे सभी ग्रामीणों को पारंपरिक वेशभूषा में मंदिर प्रांगण में आना अनिवार्य होता हैं ओर देवता के कार्यवाही मे भाग लेना पड़ता हैं। आठारो मेले मे देवता के समक्ष सभी ग्रामीण मेला करने के अलावा सुबह शाम पूजा अर्चना में भाग लेते हैं। इस मेले ने महिलाएं, पुरुष सोने चांदी से बने आभूषण व ऊन से बने वस्त्र पहनकर अपनी संस्कृति की झलक इस मेले मे दर्शाते हैं। यह मेला ग्रामीणों के रिश्तेदारों की एकजुटता का प्रमाण भी माना जाता हैं।
