हिमाचल (एकता): सुहागनों के लिए करवाचौथ का व्रत बेहद खास होता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए करवाचौथ रखती हैं। वह बिना पानी पीए रात को चंद्रमा की पूजा करके व्रत खोलती हैं। इस त्यौहार की शुरूआत पहले पंजाबी लोगों ने की। धीरे-धीरे यह त्यौहार सभी लोग रखने लगे। लेकिन कई लोग इस व्रत के रहस्य को भी जानना चाहते हैं, ये क्यों रखा जाता है। आइए जानिए इस व्रत के महत्व को। बता दें कि इस बार यह करवाचौथ का व्रत 13 अक्टूबर को मनाया जाएगा।
जानिए क्यों होती है चंद्रमा की पूजा ?
महिलाएं इस दिन चंद्रमा की पूजा करती हैं। वह छलनी से चांद को अर्घ्य देती हैं और पति को देखती हैं। रामायण के अनुसार एक बार भगवान राम ने पूर्व दिशा की तरफ चमकते हुए चंद्रमा को देखा और अपने आसपास मौजूद सभी लोगों से पूछा कि चंद्रमा में जो कालापन दिखाई दे रहा है वह क्या है? भगवान राम ने बताया कि चंद्रमा में कालापन उसके विष के कारण है। वह अपनी विषयुक्त किरणों से वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है। जो पति-पत्नी किसी कारणवश एक दूसरे से अलग हो जाते हैं, उन पर चंद्रमा की किरणें कष्ट पहुंचाती हैं, इसलिए करवा चौथ पर चंद्रमा की पूजा कर महिलाएं कामना करती हैं कि उनके कारण उन्हें अपने पति का वियोग ना सहना पड़े।
यह भी है पौराणिक मान्यता
कहा जाता है कि जब माता पार्वती ने पहला करवा चौथ का व्रत रखा था, तब उनके मायके से उनकी माता मैना ने सरगी की थाल दी थी। इसलिए आज भी नवविवाहित महिलाओं की पहली सरगी उनके मायके से ही आती है। बता दें कि करवा चौथ के दिन महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। इस बीच वह अन्न तो दूर पानी भी नहीं पीती।
महिलाएं सरगी से करती हैं व्रत की शुरूआत
महिलाएं दिन की शुरुआत सरगी से करती हैं, जो विवाहित महिलाओं को उनकी सास द्वारा दी जाती है। इसमें एक मिट्टी का बर्तन या करवा, मिठाई, सूखे मेवे, फेनी, साड़ी और आभूषण शामिल हैं। व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करती हैं, तैयार होती हैं और सरगी का सामान लेती हैं।

करवा चौथ पर किस भगवान की पूजा की जाती है?
इस दिन देवी पार्वती की बड़े पैमाने पर पूजा की जाती है, इसके बाद भगवान शिव, भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है।

वीरवती की कहानी
बहुत समय पहले की बात हैं वीरवती नाम की एक राजकुमारी थी। जब वह बड़ी हुई तो उसकी शादी एक राजा से हुई। शादी के बाद वह करवा चौथ का व्रत करने के लिए मां के घर आई। वीरवती ने भोर होने के साथ ही करवा चौथ का व्रत शुरू कर दिया। वीरवती बहुत ही कोमल व नाजुक थी। वह व्रत की कठोरता सहन नहीं कर सकी। शाम होते होते उसे बहुत कमजोरी महसूस होने लगी और वह बेहोश सी हो गई। उसके सात भाई थे और उसका बहुत ध्यान रखते थे। उन्होंने उसका व्रत तुड़वा देना ठीक समझा। उन्होंने पहाड़ी पर आग लगाई और उसे चांद निकलना बता कर वीरवती का व्रत तुड़वाकर भोजन करवा दिया। जैसे ही वीरवती ने खाना खाया उसे अपने पति की मौत की खबर मिली। उसे बड़ा दुःख हुआ और वह पति के घर जाने के लिए रवाना हुई। रास्ते में उसे शिवजी और माता पार्वती मिले। माता ने उसे बताया कि उसने झूठा चांद देखकर चौथ का व्रत तोड़ा है। इसी वजह से उसके पति की मौत हुई है। वीरवती अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने लगी। तब माता ने वरदान दिया कि उसका पति जीवित तो हो जाएगा लेकिन पूरी तरह स्वस्थ नहीं होगा।
वीरवती जब अपने महल में पहुंची तो उसने देखा राजा बेहोश था और शरीर में बहुत सारी सुइयां चुभी हुई थी। वह राजा की सेवा में लग गई। सेवा करते हुए रोज एक एक करके सुई निकालती गई। एक साल बीत गया। अब करवा चौथ के दिन बेहोश राजा के शरीर में सिर्फ एक सुई बची थी। रानी वीरवती ने करवा चौथ का कड़ा व्रत रखा। वह अपनी पसंद का करवा लेने बाजार गई। पीछे से एक दासी ने राजा के शरीर से आखिरी सुई निकाल दी। राजा को होश आया तो उसने दासी को ही रानी समझ लिया। जब रानी वीरवती वापस आई तो उसे दासी बना दिया गया। तब भी रानी ने चौथ के व्रत का पालन पूरे विश्वास से किया। एक दिन राजा किसी दूसरे राज्य जाने के लिए रवाना हो रहा था। उसने दासी वीरवती से भी पूछ लिया कि उसे कुछ मंगवाना है क्या। वीरवती ने राजा को एक जैसी दो गुड़िया लाने के लिए कहा। राजा एक जैसी दो गुड़िया ले आया। वीरवती हमेशा गीत गाने लगी” रोली की गोली हो गई …..गोली की रोली हो गई “ ( रानी दासी बन गई , दासी रानी बन गई ) राजा ने इसका मतलब पूछा तो उसने अपनी सारी कहानी सुना दी। राजा समझ गया और उसे बहुत पछतावा हुआ। उसने वीरवती को वापस रानी बना लिया और उसे वही शाही मान सम्मान लौटाया। माता पार्वती के आशीर्वाद से और रानी के विश्वास और भक्ति पूर्ण निष्ठा के कारण उसे अपना पति और मान सम्मान वापस मिला।
