संजु चौधरी, शिमला: देश भर में मशहूर कांगड़ा चाय अब विदेशों में भी मशहूर होने वाली हैं। यूरोपियन यूनियन ने कांगड़ा चाय को जी आई टैग दे दिया हैं। जी आई टैग मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कांगड़ा चाय की पहचान और मजबूत होगी। वही कांगन घाटी के चाय उत्पादकों को भी अब बड़ा मुनाफा होगा।
वहीं जी आई टैग मिलने पर पालमपुर के विधायक और सरकार में सीपीएस आशीष बुटेल ने यूरोपियन यूनियन का आभार जताया है और कहा कि ये बहुत बड़ी उपलब्धि हैं। कांगड़ा चाय को हाल ही में जी आई टैगिंग दी हैं। इसका मकसद यह है कि एक एरिया चयनित किया जाता हैं जिसमें इस तरह की चाय होती हैं। यूरोपीयन यूनियन के जितने भी देश हैं उन सब के अंदर कांगड़ा चाय के नाम से प्रसिद्ध होगी और वहां पर बिक सकती हैं। जो भी लोग कांगड़ा चाय का एक्सपोर्ट का कार्य करते हैं उनके लिए उनके लिए बहुत फायदेमंद हैं।
उन्होंने कहा कि हिमाचल में 2500 हेक्टेयर पर चाय की खेती होती हैं। कांगड़ा चाय की क्वालिटी काफी अच्छी है ओर लंबी पत्ती वाली चाय के नाम से भी इसे जाना जाता हैं। कांगड़ा चाय को भारतवर्ष में पहले ही जी आई टैग मिला हुआ हैं जिससे कांगड़ा चाय की बहुत प्रसिद्धि हुई थी। वहीं अब यूरोपियन यूनियन से जी आई टैग मिलने पर विदेशों में भी ये चाय प्रसिद्ध होगी।
174 साल पुराना हैं कांगड़ा चाय का इतिहास
कांगड़ा चाय के इतिहास करीब 174 साल पुराना हैं। साल 1849 में बॉटनिकल टी गार्डन के तत्कालीन अधीक्षक डॉ. जेम्सन ने कांगड़ा क्षेत्र घुमने आए थे। इस दौरान उन्होंने जब ये क्षेत्र देखा तो उन्हें ये चाय की खेती के लिए सबसे बेहतर लगा। इसके बाद उन्होंने कांगड़ा को चाय की खेती के लिए आदर्श बताया था। मौजूदा समय में वैश्विक स्तर पर अपनी छाप छोड़ रहा हैं।
कांगड़ा चाय का स्वाद है खास
कांगडा चाय की खेती अन्य चाय बागान क्षेत्रों की तुलना में सबसे कम में हाेती हैं। वहीं कांगड़ा चाय की विशेष पहचान हरी और काली चाय हैं।काली चाय का स्वाद मीठा हैं। वहीं हरी चाय में एक वुडी सुगंध होती हैं। इस वजह से कांगड़ा की चाय की बेहद ही मांग हैं।इसके स्वाद की वजह से स्थानीय स्तर पर ही इसकी खपत बहुत अधिक होती है,जबकि इसका निर्यात भी होता हैं।
