Dharamshala, 16 June-जहां एक ओर मैदानी इलाकों में गर्मी का कहर लोगों को बेहाल कर रहा है, वहीं पहाड़ों की ठंडी और सुकून देने वाली फिजाएं लोगों के लिए राहत का ठिकाना बन चुकी हैं। इसी राहत और आध्यात्मिक सुकून की तलाश में लोग हिमाचल की वादियों की ओर रुख कर रहे हैं। धर्मशाला की पहाड़ियों में स्थित मां गुणा देवी का मंदिर इन दिनों श्रद्धालुओं और पर्यटकों की पहली पसंद बना हुआ है।
ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक बीण की धुन के साथ पगडंडियों पर बढ़ते ये लोग किसी आम यात्रा पर नहीं बल्कि मां गुणा देवी की शरण में जा रहे श्रद्धालु हैं। धौलाधार की तलहटी में बसे इस मंदिर तक पहुंचने का रास्ता भले ही कठिन है, लेकिन श्रद्धा और आस्था हर चुनौती को छोटा बना देती है। हर वीकेंड यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, जो ना सिर्फ गर्मी से राहत पाने बल्कि आध्यात्मिक सुकून हासिल करने के लिए इस स्थल को चुनते हैं।यहां आने वालों को एक साथ कई अनुभव मिलते हैं – पहाड़ी सौंदर्य, शीतल मौसम, पारिवारिक सैर, और मां के दर्शन की आत्मिक शांति।
गर्मी से राहत और आस्था दोनों का केंद्र
धर्मशाला से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर गद्दी समुदाय की कुलदेवी मानी जाती हैं। यहां पहुंचने के लिए भक्तों को 5-7 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पैदल तय करनी पड़ती है। यह सफर थकाऊ जरूर होता है, लेकिन मां के दर्शन के बाद हर थकान, हर परेशानी जैसे खत्म हो जाती है।यही वजह है कि गुणा माता का यह मंदिर ना केवल हिमाचल बल्कि देश और विदेश से भी आस्था का केंद्र बनता जा रहा है। गर्मी में राहत और मन की शांति की तलाश कर रहे लोग यहां आकर खुद को फिर से तरोताजा महसूस करते हैं।
पर्यटकों ने साझा किया अपना अनुभव
नेहा, पर्यटक, चंडीगढ़: “मैं चंडीगढ़ से धर्मशाला घूमने आई हूं। गुणा माता मंदिर के बारे में बहुत सुना था, पर कभी आना नहीं हुआ। इस बार छुट्टियों में मौका मिला। यहां का मौसम बहुत सुहावना है, चंडीगढ़ में काफी गर्मी है। माता के दर्शन कर मन को बहुत सुकून मिला।”सिर्फ नेहा ही नहीं, चंडीगढ़ से आए संगीता और विराज भी इस अनुभव को शब्दों में बयान करते नहीं थकते।
मंदिर के पुजारी का कहना ये
मंदिर के पुजारी अशोक बताते हैं कि हर साल यहां हजारों श्रद्धालु आते हैं और गर्मियों के मौसम में इनकी संख्या कई गुना बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि मां गुणा देवी मूलतः धौलाधार की ऊंची चोटियों पर विराजमान थीं, लेकिन भक्तों की सुविधा और भलाई के लिए वे वर्तमान स्थान पर आकर विराजी हैं।
