विकास: हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के नाम से जाना जाता हैं। हिमाचल में बसने वाले देवी देवता इस नाम को सार्थक बनाते हैं। हिमाचल में कई देवताओं के मंदिरों के साथ ही कई देवियों के मंदिर भी स्थापित हैं,जहां ना केवल हिमाचल से बल्की अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। ऐसा ही एक मंदिर है जिला ऊना के चिंतपूर्णी में स्थित हैं। इस मंदिर को चिंतपूर्णी मंदिर के नाम से जाना जाता हैं। इस मंदिर को लेकर लोगों में काफी श्रद्धा और आस्था हैं और लोग यहां मां चिंतपूर्णी के दर्शन करने के लिए वर्ष भर आते रहते हैं।
इस मंदिर की पहचान चिंतपूर्णी यानी चिंता को दूर करने वाली देवी के नाम से हैं,तो वहीं इस देवी को छिन्नमस्तिका भी कहा जाता हैं। छिन्नमस्तिका का अर्थ है एक देवी जो बिना सर के हैं। कहा जाता है कि इस स्थान पर देवी सती के पवित्र चरण गिरे थे जिसके आधार पर इस मंदिर का नाम चिंतपूर्णी यानी माता के चरण के आधार पर ही रखा गया हैं।
यह हैं चिंतपूर्णी मंदिर से जुड़ा इतिहास
चिंतपूर्णी मंदिर के इतिहास की अगर बात की जाए तो प्राचीन कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि 14वीं शताब्दी में माई दास नामक दुर्गा भक्त ने इस स्थान की खोज की थी। माई दास का जन्म अठूर गांव, रियासत पटियाला में हुआ था। माई दास के दो बड़े भाई थे-दुर्गादास व देवीदास। माई दास का अधिकतर समय पूजा-पाठ में ही व्यतीत होता था, इसलिए वह परिवार के कार्यों में हाथ नहीं बंटा पाते थे इस लिए भाईयों ने माई दास को परिवार से अलग कर दिया। माई दास ने अपना समय पूजा-पाठ व दुर्गा भक्ति में व्यतीत करना जारी रखा। एक दिन माई दास अपने ससुराल जा रहे थे। रास्ते में एक वट वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गए।
थकावट के कारण माईदास की आंख लग गई और स्वप्न में उन्हें दिव्य तेजस्वी कन्या के दर्शन हुए, जो उन्हें कह रही थी कि माईदास, इसी वट वृक्ष के नीचे बीच में मेरी पिंडी बनाकर उसकी पूजा करो। तुम्हारे सब दुख दूर होंगे। माईदास को कुछ समझ न आया और वह ससुराल चले गए, ससुराल से वापस आते समय उसी स्थान पर माईदास के कदम फिर रुक गए। उन्हें आगे कुछ न दिखाई दिया। वह फिर उसी वट वृक्ष के नीचे बैठ गए और स्तुति करने लगे। उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की। हे दुर्गा मां यदि मैंने सच्चे मन से आपकी उपासना की है तो दर्शन देकर मुझे आदेश दो। बार-बार स्मृति करने पर उन्हें सिंह वाहनी दुर्गा के दर्शन हुए। देवी ने कहा कि मैं उस वट वृक्ष के नीचे चिरकाल से विराजमान हूं। लोग यवनों के आक्रमण ओर अत्याचारों के कारण मुझे भूल गए हैं। तुम मेरे परम भक्त हो। अतः यहां रहकर मेरी आराधना करो। यहां तुम्हारे वंश की रक्षा मैं करुंगी। फिर इसी वट वृक्ष के नीचे आज भी दुर्गा भगवती का मंदिर हैं। तब इस जगह का नाम छपरोह था ओर यहां घना जंगल था, जिसे अब चिंतपूर्णी कहते हैं।
पुराणों के अनुसार चिंतपूर्णी मंदिर कि चारों दिशाओं में हैं महादेव के 4 मंदिर
माईदास जी ने कहा कि मैं यहां पर रहकर कैसे आपकी आराधना करुंगा। यहां पर घने जंगल में न तो पीने योग्य पानी है और न ही रहने योग्य उपयुक्त स्थान। मां दुर्गा ने कहा कि मैं तुमको निर्भय दान देती हूं कि तुम किसी भी स्थान पर जाकर कोई भी शिला उखाड़ो वहां से जल निकल आएगा। इसी जल से तुम मेरी पूजा करना। आज इसी वट वृक्ष के नीचे मां चिंतपूर्णी का भव्य मंदिर है और वह शिला भी मंदिर में रखी हुई है, जिस स्थान पर जल निकला था। वहां आज सुंदर तालाब हैं । आज भी उसी स्थान से जल निकाल कर माता का अभिषेक किया जाता हैं। पुराणों के अनुसार यह स्थान चार महारुद्र के मध्य स्थित हैं। एक और कालेश्वर महादेव, दूसरी ओर शिववाड़ी, तीसरी ओर नारायण महादेव, चौथी ओर मुचकंद महादेव हैं।
मार्केंडेय पुराण के अनुसार मां को छिन्नमस्तिका भी कहा जाता हैं
मार्केंडेय पुराण के अनुसार ऐसा विश्वास किया जाता है कि सती चंडी की सभी दुष्टों पर विजय के उपरांत, उनके दो शिष्यों अजय और विजय ने सती से अपनी खून की प्यास बुझाने की प्रार्थना की थी। यह सुनकर सती चंडी ने अपना मस्तिष्क छिन्न कर लिया,इसलिए सती का नाम छिन्नमस्तिका पड़ा। 12 जून 1987 से इस मंदिर को हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर स्थापित किए गए ट्रस्ट के माध्यम से चलाया जाता हैं।
हर वर्ष चढ़ता हैं करोड़ो का चढ़ावा
माता चिंतपूर्णी का मंदिर प्रदेश भर में सबसे अमीर मंदिरों में शामिल है इस मंदिर में वर्ष भरा श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है यहां हिमाचल संहिता पंजाब से भी श्रद्धालु मां चिंतपूर्णी के दर्शन करने के साथ ही पूजा-अर्चना करने के लिए पहुंचते हैं वहीं श्रद्धालुओं से मंदिर में दिल खोलकर माता रानी को चढ़ा हुआ भी चढ़ाते हैं हर वर्ष यहां भक्तों की ओर से करोड़ों की नगदी के साथ ही सोने चांदी के आभूषण भी माता रानी को भेंट स्वरूप चढ़ाए जाते हैं।
