Shimla, Sanju-हिमाचल एक बार फिर संकट में है। सड़कों पर मलबा, गांवों में सन्नाटा, और बादलों की गड़गड़ाहट से सहमा हुआ हर चेहरा। लेकिन सवाल ये है कि क्या हर बार सिर्फ मौसम को दोष देना ठीक है? या इस तबाही की पटकथा हमने खुद लिखी है?
हमने बात की हिमाचल पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. सुरेश अत्री से—जिन्होंने बताया, असली कारण सिर्फ बारिश नहीं है।
तबाही का असली चेहरा:
मॉनसून की आमद के सिर्फ दो हफ्तों में ही हिमाचल का हाल बेकाबू हो चुका है। क्लाउडबर्स्ट यानी बादल फटने की घटनाएं अचानक बढ़ गई हैं। डॉ. अत्री बताते हैं—जब कुछ मिनटों में सीमित इलाके में 100 मिमी से ज्यादा बारिश होती है, तो वो बादल फटने की श्रेणी में आता है। पहाड़ी ढलानों और संकरी घाटियों में ये पानी तबाही बनकर बहता है।टोपोग्राफी, जलवायु परिवर्तन और हवा में बढ़ती नमी—ये त्रिकोण मिलकर विनाश का फॉर्मूला बनाते हैं।
मैदानी इलाकों में क्यों नहीं फटते बादल?
मैदानी इलाकों में बादल नहीं फटते—क्यों? इसका कारण है वहां की स्थिर हवा और समतल ज़मीन। ऊंचाई के अभाव में ओरोग्राफिक इफेक्ट नहीं बनता, जिससे बारिश व्यापक होती है, केंद्रित नहीं।डॉ. सुरेश अत्री ने बताया किपहाड़ों में हवा ऊपर उठकर तेजी से ठंडी होती है, जिससे बादल अचानक फटते हैं। मैदानी क्षेत्र इस प्रभाव से बचे रहते हैं।”
पौधारोपण भी बना नई समस्या:
सिर्फ बारिश नहीं, लापरवाही भी इस विनाश की जिम्मेदार है। डॉ. अत्री कहते हैं—अंधाधुंध पौधारोपण, वो भी बिना वैज्ञानिक आकलन के, स्थानीय इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा रहा है। विदेशी प्रजातियां, घास के मैदानों की जगह ले रही हैं—जल प्रवाह का संतुलन बिगड़ रहा है।
ग्लोबल वॉर्मिंग + लोकल लापरवाही = हर साल तबाही:
पश्चिमी विक्षोभ बार-बार सक्रिय रहे हैं। एल नीनो और ला नीना जैसे वैश्विक घटनाएं भी स्थानीय मौसम को अस्थिर कर रही हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है—हम क्या कर रहे हैं?
डॉ. सुरेश अत्री ने कहा कि “बिना भूगर्भीय सर्वे, बिना पर्यावरण मूल्यांकन के हर निर्माण कार्य खतरे की नींव है।”
हिमाचल के पहाड़ अब खुद कह रहे हैं—”बस करो!”प्रकृति की भाषा समझना जरूरी है, क्योंकि ये सिर्फ चेतावनी नहीं, अगली आपदा की आहट है।विज्ञान ने रास्ता दिखाया है—अब नीति को उसे अपनाना होगा।वरना, हर साल बारिश नहीं, पछतावा बरसेगा।
