राहुल चावला,धर्मशाला: धर्मशाला की पद्धर पंचायत की फिज़ा में आजकल बबूने के फूल (कैमोमाइल) और काली तुलसी की खुशबू तैर रही हैं। पद्धर और घिरथोली गांवों की महिलाओं ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में स्वयं सहायता समूह बनाकर बबूने के फूल और काली तुलसी की हर्बल खेती से रोज़गार का नायाब ज़रिया ढूंढ निकाला है, जिसकी मदद से वे घर के कामों के साथ ही परिवार की आर्थिक रूप से भी सहायता कर रही हैं।
पद्धर के वैष्णो स्वयं सहायता समूह की सदस्य कमला देवी का कहना है कि अपनी करीब 1 बीघा जमीन पर परंपरागत खेती से हट कर कैमोमाइल आजमाने की सोची। खेती के लिए विभाग से बीज फ्री मिल गए और ट्रेनिंग का प्रबंध भी जिला प्रशासन ने ही किया। जोगिंदरनगर और सोलन में लगे प्रशिक्षण कैंप में जाकर हर्बल खेती की बारकियां सीखीं और फिर आकर इसमें जुट गईं।
वे साल भर से इसमें लगी हैं और बबूने के फूलों की करीब 30 किलो की एक फसल ले चुकी है और इससे लगभग 13-14 हजार रुपए की आमदन उन्हें मिली हैं।6-6 महीने के साइकल में की जाने वाली ये खेती नवंबर से मई और फिर मई से नवंबर के पीरियड में की जाती हैं।
अपनी जमीन के बीघा भर में हर्बल खेती कर रही वैष्णो स्वयं सहायता समूह की ही एक और सदस्य आशा देवी बताती हैं कि यह खेती पूरी तरह प्राकृतिक हैं। इसमें केमिकल मिली खाद का प्रयोग नहीं किया जाता। जंगली जानवर भी इसे नुकसान नहीं पहुंचाते। बबूने के फूल और काली तुलसी के साथ कुछ पौधे अश्वगंधा, जटामासी ओर चिया सीड के भी लगाए हैं। उनकी भी बाजार में अच्छी खासी डिमांड हैं। उन्हें मार्केट उपलब्ध करवाने में भी जिला प्रशासन पूरी मदद कर रहा हैं।
बबूने के फूल और काली तुलसी के स्वास्थ्य के लिए अनेक फायदे हैं। इन्हें ग्रीन टी बनाने में उपयोग में लाया जाता है, जो अनिद्रा, पेट और लीवर की दिक्कतों तथा बीपी और शूगर जैसे विकारों को नियंत्रित करने में रामबाण है। इसके अलावा इनका सौंदर्य प्रसाधन उत्पादों में भी इस्तेमाल होता है। वहीं चिया सीड भी पाचन, तनाव और उच्च रक्तचाप को दुरूस्त रखने में मददगार हैं।
आशा देवी समेत गांव की तमाम महिलाओं की मदद के लिए स्वयं सहायता समूहों की सभी सदस्य प्रशासन और सरकार का आभार जताते हुए कहती हैं कि वे हर्बल खेती से अपने पैरों पर खड़ी हुई हैं, उन्हें पैसा भी मिल रहा हैं और उन्हें व उनके गांव को नई पहचान भी मिली हैं।
