शिमला-:स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) हिमाचल प्रदेश राज्य कमेटी ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (HPU) तथा प्रदेश के महाविद्यालयों में प्रस्तावित एवं लागू फीस बढ़ोतरी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन पर कथित वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। SFI ने मांग की है कि फीस बढ़ोतरी तत्काल वापस ली जाए तथा विश्वविद्यालय में CAS पदोन्नतियों, वरिष्ठता निर्धारण और नियुक्तियों से जुड़े मामलों की स्वतंत्र न्यायिक जांच करवाई जाए।एसएफआई का कहना है कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय एक राज्य द्वारा वित्तपोषित विश्वविद्यालय है और उसके संचालन एवं वित्तीय दायित्व में राज्य सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में विश्वविद्यालय की कथित वित्तीय कमियों का बोझ सीधे छात्रों पर फीस बढ़ाकर डालना पूरी तरह अनुचित है।
वरिष्ठता सूची में बदलाव पर एसएफआई ने विश्वविद्यालय की वरिष्ठता सूची में कथित विसंगतियों को लेकर सवाल उठाए हैं। संगठन के अनुसार, कुलसचिव द्वारा 7 जुलाई 2021 को जारी सूची में PG Centre के 31 सहायक आचार्य डॉ. राजिंदर वर्मा का नाम चौथे स्थान पर था और उनकी सहायक आचार्य के रूप में जॉइनिंग 13 जून 2017 दर्ज थी।SFI का आरोप है कि 15 नवंबर 2025 की सूची में उन्हें 8 अक्टूबर 2015 से Professor के रूप में पदोन्नत दिखाते हुए 36वें स्थान पर वरिष्ठता प्रदान की गई। संगठन ने सवाल उठाया है कि यदि सहायक आचार्य के रूप में जॉइनिंग वर्ष 2017 में दर्ज है, तो वर्ष 2015 से प्रोफ़ेसर के रूप में वरिष्ठता निर्धारित करने का आधार क्या है और इसके लिए कौन-सा UGC Regulation अथवा कानूनी प्रावधान लागू किया गया?
नियम-विरुद्ध वित्तीय लाभ का बोझ छात्रों पर क्यों?
एसएफआई ने आरोप लगाया कि यदि किसी कर्मचारी या शिक्षक को नियमों के विपरीत पदोन्नति, वेतन, एरियर अथवा अन्य वित्तीय लाभ दिए जाते हैं तो उसका सीधा असर विश्वविद्यालय के बजट पर पड़ता है। संगठन का सवाल है कि ऐसी कथित अनियमितताओं से उत्पन्न वित्तीय बोझ की भरपाई छात्रों की फीस बढ़ाकर क्यों की जाए?SFI ने कहा कि “शिक्षकों की कथित नियम-विरुद्ध पदोन्नतियों का आर्थिक बोझ छात्र क्यों उठाएं?”
प्रशासनिक पदों की भी हो समीक्षा
एसएफआई ने मांग की है कि कथित गलत वरिष्ठता के आधार पर दिए गए Dean, Head सहित अन्य प्रशासनिक पदों और उस अवधि में लिए गए नीतिगत एवं प्रशासनिक निर्णयों की वैधानिकता की स्वतंत्र समीक्षा की जाए।संगठन ने यह भी सवाल उठाया कि Pro-Vice-Chancellor (PVC) का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी संबंधित व्यक्ति को विश्वविद्यालय के कार्यालय, वाहन, स्टाफ और अन्य संसाधनों का उपयोग किस आदेश या वैधानिक अधिकार के तहत दिया जा रहा है। SFI ने प्रशासन से संबंधित आदेश और उस पर होने वाले खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक करने की मांग की है।
कुलपति की चुप्पी पर एसएफआई ने उठाए सवाल
एसएफआई ने कहा कि संगठन द्वारा विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखित ज्ञापन सौंपे जाने के बावजूद इन गंभीर आरोपों पर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है। संगठन ने कुलपति प्रो. महावीर सिंह से मांग की है कि यदि सभी पदोन्नतियां, नियुक्तियां और प्रशासनिक फैसले नियमों के अनुरूप हैं तो संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं और यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

