चन्द्रिका – हिमाचल प्रदेश में शक्तिपीठ नैना देवी मंदिर श्रद्धालुओं का आस्था का केन्द्र है। यहां न सिर्फ हिमाचल से बल्कि अन्य राज्यों विशेषकर पंजाब से काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। जिला बिलासपुर का ये मंदिर देवी के 51 शक्तिपीठों में शामिल है।
समुद्र तल से 11000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नैना देवी मंदिर वे स्थान हैं जहां पर पर देवी सती के नेत्र गिरे थे। पौराणिक कथा के अनुसार देवी सती ने स्वयं का अंत कर लिया था, जिससे भगवान शिव व्यथित हो उठे। उन्होंने सती के शव को कंधे पर उठाया और तांडव नृत्य शुरू कर दिया। जिससे सभी देवता भयभीत हो उठे, भोलेनाथ का यह रूप प्रलय ला सकता था। सभी देव गणों ने भगवान विष्णु से यह आग्रह किया कि अपने चक्र से सती के शरीर को टुकड़ों में विभक्त कर दें। ऐसे में श्री नैना देवी मंदिर वह स्थान है जहां देवी सती के नेत्र गिरे थे।
इस मंदिर में पीपल का पेड़ मुख्य आकषर्ण का केंद्र है जो शताब्दियों पुराना है। मंदिर के मुख्य द्वार के दाई ओर भगवान गणेश और हनुमान कि मूर्ति है। मंदिर के गर्भ ग्रह में मुख्य तीन मूर्तियां हैं। दाई तरफ माता काली की, मध्य में नैना देवी की और बाई ओर भगवान गणेश की प्रतिमा है। यहां एक पवित्र जल का तालाब है, जो मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित है। मंदिर के समीप एक गुफा है जिसे नैना देवी गुफा के नाम से जाना जाता है।
मंदिर से संबंधित एक अन्य कहानी ये भी
मंदिर से संबंधित एक अन्य कहानी नैना नाम के गुज्जर लड़के की है। एक बार वह अपने मवेशियों को चराने गया और देखा कि एक सफेद गाय अपने थनों से एक पत्थर पर दूध बरसा रही है। उसने अगले कई दिनों तक इसी बात को देखा। एक रात जब वह सो रहा था, उसने देवी मां को सपने मे यह कहते हुए देखा कि वह पत्थर उनकी पिंडी है। नैना ने पूरी स्थिति और उसके सपने के बारे में राजा बीर चंद को बताया। तब राजा ने उसी स्थान पर श्री नैना देवी नाम के मंदिर का निर्माण करवाया।
यहां है अद्भुत प्राचीन हवन कुंड
नैना देवी मंदिर में एक प्राचीन हवन कुंड भी है, जो अदभुत है। कहते हैं कि इसमें जितना मर्जी हवन करते जाओ शेष कभी नहीं उठाना पड़ता। सारी राख भभूति इसी के अंदर समा जाती है। इस हवन कुंड में श्रद्धालु विजय प्राप्ति के लिए, दुख रोग कष्ट दूर करने के लिए, धन प्राप्ति के लिए कई प्रकार के हवन किए जाते हैं। कहते हैं कि घर में 100 हवन करने के बराबर इस हवन कुंड में एक हवन की मान्यता है।
