भावना शर्मा: पहाड़ों की रानी शिमला में स्थित विश्व प्रसिद्ध कालीबाड़ी मंदिर अपनी स्थापना के 200 वर्ष पूरे कर चुका हैं। यह मंदिर अपने आप में बेहद खास है क्योंकि इसी मंदिर के नाम पर शिमला शहर का नाम पड़ा हैं। कालीबाड़ी का यह मंदिर जिसका निर्माण 1823 में करवाया गया था यह मंदिर देवी श्यामला को समर्पित हैं। मां श्यामला को मां काली का रूप माना जाता हैं। शिमला को भी पहले श्यामला ही कहा जाता था फिर आम बोलचाल की भाषा में श्यामला से यह शिमला हो गया और अब इसे शहर की पहचान है विश्व भर में शिमला से ही हैं।
ब्रिटिश कालीन समय से ही शिमला में मां श्यामला यानी मां काली का यहां पर वास हैं। उस समय एक बंगाली ब्राह्मण राम चरण ब्रह्मचारी ने जाखू हिल्स में आसपास काली बाड़ी मंदिर का निर्माण किया था लेकिन जब अंग्रेजों ने शिमला को अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया और वह स्थान पर रहने के लिए आए तो मंदिर में होने वाली पूजा अर्चना और यहां आने वाले लोगों से और शोर-शराबे से होने वाली दिक्कतों को देखते हुए अंग्रेजों ने इस मंदिर को यहां से स्थानांतरित करवा दिया था। इसके बाद 1823 है में शिमला के स्केंडल पॉइंट से कुछ ही दूरी पर मंदिर का निर्माण करवा कर यहां मां काली की मूर्तियों की स्थापना की गई। इसके बाद से इस स्थान और इस मंदिर को कालीबाड़ी मंदिर के नाम से ही जाना जाता हैं। ब्रिटिश काल में बने इस मंदिर के स्थान पर पहले एक गुफा हुआ करती थी।
आज भी मंदिर की देखरेख और पूजा-अर्चना बंगाली समुदाय के पुजारी हैं करते आ रहे हैं। मंदिर में रोजाना पूजा अर्चना के साथ ही नवरात्रों के अवसर पर विशेष पूजा अर्चना की जाती हैं। वहीं अक्टूबर माह में आने वाले नवरात्र पर यहां की दुर्गा पूजा भी काफी प्रसिद्ध हैं। मंदिर में तीन पहर की आरती के साथ ही माता रानी को भोग भी लगाया जाता हैं।
मंदिर में मां काली की लकड़ी की नीले रंग की मूर्ति हैं स्थापित
कली बड़ी मंदिर में रखी गई मां काली की प्रतिमा भी अपने आप में बेहद अलग है यहां मां काली की लकड़ी की प्रतिमा स्थापित की गई है जो कि नीले रंग की हैं। कालीबाड़ी मंदिर में काली माता की मूर्ति के साथ एक तरफ श्यामला माता तो दूसरी तरफ चंडी माता की शिला हैं। इस मंदिर में माता की पत्थर की मूर्ति भी लगी हुई हैं। इस मूर्ति में लगे पत्थरों को जयपुर से मंगवाया गया था।
1885 में हुआ था कालीबाड़ी प्रबंधन कमेटी का गठन
कालीबाड़ी मंदिर के निर्माण के बाद वर्ष 1885 में शिमला कालीबाड़ी प्रबंधन कमेटी का गठन हुआ। उसके बाद 1903 में कालीबाड़ी मंदिर ट्रस्ट बना, जो इस मंदिर को आज तक चला रहा हैं। मंदिर के पुजारी ने बताया कि ब्रिटिश काल में मंदिर के आने के लिए कोई भी रास्ता नहीं था। बाद में एक पुजारी को मां ने सपने में दर्शन दिए और मंदिर के लिए रास्ता बनाने के लिए कहा। रास्ता बनने के बाद धीरे-धीरे श्रद्धालु यहां आना शुरू हुए।
बंगाल से भी दर्शनों के लिए पहुंचते हैं श्रद्धालु
शिमला में स्थित कालीबड़ी मंदिर में श्रद्धालुओं की बड़ी आस्था है स्थानीय लोगों के साथ ही पर्यटक भी इस मंदिर में मां काली के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। बंगाल से भी नवरात्रों पर माता के दर्शनों के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं और यहां होने वाली विशेष दुर्गा पूजा में भाग लेते हैं।
