समाजसेवी रमेश कालिया और मंगल सिंह ने पहल कर इन बेजुबानों को बचाने का संकल्प लिया। मगर उफान मारती नदी में नाव से पहुँचना किसी जोखिम से कम नहीं था। ऐसे में भूतपूर्व सैनिक नूर मोहम्मद और संजीब अली ने हिम्मत दिखाई और जान की परवाह किए बिना नाव के ज़रिए चारा टापू तक पहुँचाया।इस मुहिम में गाँव स्थाना के बाली शर्मा और उमित ने भी साथ निभाया। प्रशासन और स्थानीय लोगों ने इस पूरी टीम की सराहना करते हुए कहा कि जब इंसानियत जागती है, तो हर मुश्किल को पार किया जा सकता है।यह कदम समाज के लिए भी एक सीख है कि पशु-प्रेम केवल बातों या तस्वीरों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वास्तविकता में ज़मीन पर किए गए कामों से साबित होता है। रमेश कालिया और उनकी टीम ने यह कर दिखाया।समाजसेवी रमेश कालिया और मंगल सिंह ने कहा कि हमने महसूस किया कि ये गौ-वंश भूख और प्यास से तड़प रहे हैं। टीम के साथ मिलकर चारा पहुँचाना और उन्हें बचाना हमारा इंसानी फर्ज था। असली मदद वही है जहाँ जोखिम उठाकर किसी की जान बचाई जाए।
व्यास नदी के टापू पर फंसे बेजुबानों के लिए देवदूत बने समाजसेवी और पूर्व सैनिक
2 September, Kangra-पौंग डैम से छोड़े गए पानी ने व्यास नदी को रौद्र रूप दे दिया। तेज़ बहाव में जिला कांगड़ा के फतेहपुर उपमंडल के रियाली क्षेत्र में बने एक टापू पर लगभग 25 गौ-वंश तीन दिनों से भूख और प्यास से जूझ रहे थे। लेकिन इस मुश्किल हालात में इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए कुछ जांबाज़ लोग उनकी मदद के लिए आगे आए।
Leave a comment
Leave a comment
