Shimla, Sanju-दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा श्री राम मंदिर, शिमला में आयोजित सात दिवसीय श्रीकृष्ण कथा का भव्य समापन दिव्य ऊर्जा और आध्यात्मिक संदेशों के साथ हुआ। कथा के अंतिम दिन संस्थान की विदुषी एवं श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या, साध्वी सुश्री रुपेश्वरी भारती जी ने श्रीकृष्ण जीवन लीला को आध्यात्मिक रहस्यों से जोड़ते हुए श्रोताओं को आत्मचिंतन की ओर प्रेरित किया।
साध्वी जी ने कहा, “प्रभु की कथा केवल श्रवण की वस्तु नहीं, बल्कि एक आंतरिक क्रांति है। यह वह परिवर्तन है जो व्यक्ति की चेतना को जागृत करता है। जब मनुष्य के अंतर्मन में प्रभु का प्रकाश प्रकट होता है, तभी वह सच्चे अर्थों में ईश्वर को जान पाता है।”उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता न केवल प्रेम की मिसाल है, बल्कि भक्ति और समर्पण की भी पराकाष्ठा है। “भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा के तंदुल इसलिए स्वीकार किए क्योंकि वह भाव के भूखे हैं, पदार्थ के नहीं,” साध्वी जी ने कहा।
वर्तमान समाज की चुनौतियों की ओर संकेत करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सामाजिक परिवर्तन के लिए केवल बाहरी प्रयास नहीं, बल्कि अंतरात्मा का जागरण आवश्यक है। “संपूर्ण परिवर्तन तभी संभव है जब व्यक्ति ब्रह्मज्ञान द्वारा आत्मप्रकाश का अनुभव करे। यही अध्यात्म की वास्तविक शुरुआत है।”
कार्यक्रम का शुभारंभ भाजपा प्रदेश मीडिया प्रभारी कर्ण नंदा, संत निरंकारी मिशन शिमला संयोजक हेमराज भारद्वाज, नूरमहल पंजाब से पधारे स्वामी गिरिधरानंद और स्वामी धीरानंद द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ।कथा के अंतिम दिवस पर रुक्मणी विवाह का अलौकिक प्रसंग सुनाया गया, जिसे श्रोताओं ने अत्यंत भावविभोर होकर सुना। साध्वी जी ने इस प्रसंग को आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक बताया। समापन पर भक्तजनों ने भजनों पर झूमते हुए आरती में भाग लिया।
संस्थान का उद्देश्य:
साध्वी जी ने बताया कि दिव्य ज्योति जागृति संस्थान का उद्देश्य संपूर्ण विश्व को आध्यात्मिक बंधुत्व की भावना में जोड़ना और ब्रह्मज्ञान द्वारा प्रत्येक मानव को ईश्वर से प्रत्यक्ष जोड़ना है।
