संजीव महाजन: हिमाचल प्रदेश देवी -देवताओं की भूमि हैं। इस भूमि पर भगवान किसी ना किसी रुप में हर जगह विराजमान हैं और सदियों से लोगों में इन देवी देवताओं ओर भगवान में विश्वास,आस्था बनी हुई हैं। हिमाचल में अनेकों ही ऐसे मंदिर हैं जिनकी कुछ न कुछ मान्यता ओर भव्यता हैं। ऐसी ही अद्भुत मान्यताओं वाला एक मंदिर नूरपुर विधानसभा की वरंडा कंडवाल में स्थित हैं। इस मंदिर को प्राचीन प्रसिद्ध छोटी नागनी माता के मंदिर के नाम से जाना जाता हैं।
यह मंदिर ऐसा मंदिर हैं जहां से लोगों की प्राचीन समय से ही यह मान्यता हैं कि यहां की मिट्टी जिसे शक्कर कहते हैं वह लगाने से सांप के डंसे हुए का ज़हर उतर जाता हैं। इस मिट्टी को अगर सांप के डसने की जगह पर लगा दे तो सांप के विष का असर कम हो जाता हैं। आज भी इस मंदिर में सांप काटे लोग आते हैं और पुजारी से शक्कर लगवाते हैं और यहां से ठीक हो कर जाते हैं। जिस व्यक्ति को सांप ने काटा होता हैं उस व्यक्ति को मंदिर में पांच या सात दिन रहना पड़ता हैं।
मंदिर में सांप के डसे का इलाज़ होने के साथ ही मंदिर में जिन लोगों के बच्चे बोल नहीं सकते हैं या हाथ पांव में दिक्कत हो वो सच्चे मन से माता रानी के दरबार में मन्नत मांगता हैं तो वह ठीक हो जाता हैं। फिर माता के दरबार में चांदी की जिह्वा, हाथ पैर चढ़ा कर जाते हैं। यह सिलसिला वर्षों से चलता आ रहा हैं।
मंदिर में सावन के माह में माता रानी के मेले लगते हैं। मेलों के दौरान माता हर साल अपने दर्शन छोटे नाग के रुप में मंदिर में देती हैं। मेले के दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर कमेटी की ओर से श्रद्धालुओं को कोई दिक्कतों का सामना ना करना पड़े उसको देखते मंदिर में व्यवस्थाओं को सुचारु ढंग से किया हुआ हैं।
120 साल पुराना हैं नागनी माता मंदिर का इतिहास
मंदिर पुजारी अजय शर्मा ने कहा कि यह जो माता का मंदिर है यह छोटी नागनी माता के नाम से प्रसिद्ध हैं। यह लगभग 120 साल पुराना मंदिर हैं। इस मंदिर को गोरखा बाबा ने बनाया था। जब यहां पास में रेलवे पुल का काम चला हुआ था तब वहां नेपाल से लेबर आई हुई थी। गोरखा बाबा उस लेबर के इंचार्ज थे। पुल का काम खत्म होने के बाद लेबर वापिस चली गई पर गोरखा बाबा यही रुक गए और जो नीचे शिवालय हैं वहीं बाबा जी भक्ति पूजा पाठ करने लगे। बाबा जी ने यहां धुना रमाया हुआ था। बाबा जी ने गाय भी पाली हुई थी, जिनका नाम गंगा , जमुना ,सरस्वती था।
एक रात बाबा जी को स्वप्न हुआ ओर माता ने उन्हें दर्शन दिए। मान्यता यह है कि माता उनकी जटाओं से प्रकट हुई थी। माता ने कहा कि यहां मंदिर का निर्माण किया जाए। यह प्राचीन शीला जो मंदिर में रखी गई हैं उसे गोरख बाबा ने यहां रखा था। जैसे- जैसे लोगों को पता चलने लगा कि यहां पर सांप के काटने पर अगर मन्नत मांगें तो वह ठीक हो जाता हैं। जो भी मन्नत यहां मांगी जाती हैं वो पूरी हो जाती है तो धीरे धीरे माता की मान्यता बढ़ने लगी और मंदिर की जगह कम पड़ने लगी। यहां सावन माह में मेले लगते हैं तो उस समय लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं।
आज भी मंदिर परिसर में दर्शन देती है मां
लोगों की मान्यता है कि वर्षों से लेकर आ जाए 21वीं शताब्दी में भी माता यहां खुद अपने भक्तों को दर्शन देती हैं। माता छोटे नाक के रूप में यहां पर दर्शन देती हैं। मंदिर में विशेष रूप जिनके बच्चे बोल नहीं पाते वो यहां माता को चांदी की जिह्वा चढ़ाते हैं। वहीं जिनके बच्चे चलते नहीं है वह यहां हाथ पैर चांदी के बनवा कर माता को समर्पित करते हैं।
कालसर्प दोष निवारण के लिए भी मंदिर में होता हैं पूजन
छोटी नागनी माता मंदिर में कालसर्प दोष का भी निवारण किया जाता हैं। जिनकी कुंडली में कालसर्प दोष होता है वह यहां पूजन के लिए आते हैं। यहां पर समय-समय पर भंडारे भी लगाए जाते हैं। युवा मंडल हर साल जून माह में एक विशाल भंडारे का आयोजन यहां करता हैं। इसके अलावा इस मंदिर में 35 सालों से धर्मराज, यम राज,चित्रगुप्त की मूर्ति स्थापित की गई हैं जिसकी पूजा करने लोग आते हैं। माता रानी के प्रति लोगों की अटूट आस्था हैं यही वजह हैं कि यहां वर्ष भर भक्तों का तांता लगा रहता हैं।
