Dharamshala, Rahul-:हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल ने धर्मशाला में आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला “आपदा न्यूनीकरण और रणनीतियाँ: जोखिम से लचीलेपन तक” का शुभारंभ किया। यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए), कांगड़ा द्वारा एस्टन विश्वविद्यालय (यूके) तथा नेशनल डोंग हुआ विश्वविद्यालय (ताइवान) के सहयोग से आयोजित किया गया।
उद्घाटन सत्र में प्रो. बंसल ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु खतरों को देखते हुए आपदा तैयारी और सामुदायिक लचीलापन को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है।कार्यशाला के संयोजक और पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता प्रो. दीपक पंत ने अपने संबोधन में कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान और स्थानीय समुदायों के बीच संवाद आपदा प्रबंधन की रीढ़ है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जंगल की आग के दौरान मीथेन जैसे गैस उत्सर्जनों की निगरानी आपदा की तीव्रता और पर्यावरणीय प्रभावों को समझने में सहायक हो सकती है।उन्होंने यह भी कहा कि अनुचित अपशिष्ट प्रबंधन अब एक उभरती हुई पर्यावरणीय आपदा का रूप ले चुका है, और कूड़ाघरों से निकलने वाला मीथेन जलवायु परिवर्तन में अहम भूमिका निभा रहा है।
कार्यशाला के पहले दिन विशेषज्ञों ने “आपदा कैलेंडर” तैयार करने पर गोलमेज चर्चा की, जिसका उद्देश्य वर्षभर संभावित खतरों और संवेदनशील मौसम अवधियों की पहचान कर प्रभावी तैयारी ढांचा विकसित करना है।साथ ही, जैविक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन पर आयोजित पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने महामारियों, पारिस्थितिक असंतुलन और स्वास्थ्य जोखिमों पर विचार साझा किए।हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. नीरज गुप्ता ने अपने संबोधन में रासायनिक अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर चिंता व्यक्त की और कहा कि औद्योगिक और प्रयोगशाला अपशिष्ट, यदि नियंत्रित न किए जाएं, तो दीर्घकालिक पर्यावरणीय खतरे उत्पन्न कर सकते हैं।
