चिंतपूर्णी :विकास शर्मा (TSN)- नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पित व प्रतिबद्ध अनुशासित जीवन, शारीरिक व मानसिक तौर पर हर समय सक्रिय और सदैव शाकाहार को प्राथमिकता देने वाले धर्मसाल महंता गांव के पूर्व शिक्षक विधि चंद शास्त्री शनिवार को अपना 100वां जन्मदिन मना रहे हैं।13 जनवरी, 1924 काे माता सरस्वती देवी व पिता राम के घर पैदा हुए शास्त्री ने ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के मार्ग पर चलते हुए एक शताब्दी का सफर तय किया है।
उम्र के इस पड़ाव में भी उनकी की दिनचर्या में आज भी कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। सुबह पांच बजे बिस्तर को छाेड़ देते हैं और उसके बाद घर-आंगन में ही सैर करते हैं। नहाने के बाद नियमित रूप से पूजा-पाठ करते हैं। अखबार व किताबें पढ़ने का विशेष शौक है। उनके पास एक हजार से ज्यादा पुस्तकों का संग्रह है। नाश्ता करने के बाद कुछ समय गौ सेवा के लिए आज भी देते हैं। सात्विक भोजन ही जीवन भर लिया है और बड़ी बात यह भी कि आज तक उन्होंने कभी चाय का स्वाद नहीं चखा। बाहर के खाने को कभी प्राथमिकता नहीं दी। बतौर शिक्षक उन्होंने 38 वर्ष तक सेवाएं प्रदान कीं। इस दौरान पांच वर्ष तक निजी शिक्षण संस्थान में भी विद्यार्थियों को पढ़ाया। शास्त्री के बेटे मैथिली शरण पराशर का कहना है कि उनके पिता आज भी अपने दैनिक कार्य खुद करते हैं। घर में पालतू गाय की सेवा में भी योगदान देते हैं और लिखना-पढ़ना भी उनकी दिनचर्या में शामिल है।
इस तरह रहा शास्त्री जी के जीवन का सफर
विधि चंद शास्त्री की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू पाठशाला, धर्मसाल महंता में हुई। इसी पाठशाला से उन्हें प्राज्ञा (मैट्रिक के समकक्ष) की शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1941 में पंजाब के गुरदासपुर से पंडोरी धाम के संस्कृत महाविद्यालय से विशारद की डिग्री ली और एसडी कालेज, लाहौर से शास्त्री की उपाधि ली। 1942 में उन्होंने राजकीय उच्च विद्यालय, रामदास, अमृतसर से अध्यापन कार्य शुरू किया। वर्ष 1957 में उन्हें सरकारी नौकरी मिली। पहली नियुक्ति लाहौल स्पीति के राजकीय मिडल स्कूल, जाहलमा में हुई। उसके बाद शास्त्री ने गंगथ, देहरा और भरवाईं में भी सेवाएं दी। 31 जनवरी, 1985 को वह राजकीय उच्च विद्यालय, धर्मसाल महंता से सेवानिवृत हुए। सेवानिवृति के बाद भी विधि चंद अपनी नियमित दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं किया और पूर्व की तरह लिखने-पढ़ने को समय देते रहे हैं।
हर रोज नया सीखने की कोशिश में रहते हैं शास्त्री-
शास्त्री का कहना है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है और अब भी कुछ नया सीखने के प्रयास में रहते हैं। उनका कहना था कि किसी भी इंसान की सच्चा साथी पुस्तकें होती हैं और इनसे हमेशा जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। विधि चंद का यह भी कहना है कि प्रकृति के सानिध्य में आदमी को ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहिए। प्रकृति की शरण में एक नन्हा सा बीज विशाल वृक्ष बन जाता है। ऐसे में प्रकृति के आंचल में ही जीवन जीना चाहिए। कहा कि उनके जीवन में यह सुखद अनुभूति रही है कि वह जिस स्थान पर रहते हैं, वहां खुला वातावरण व साफ हवा मिलती है। जीवन में सामाजिक होना भी अहम है। शास्त्री ने कहा कि अगर आपके सामाजिक संपर्क बेहतर हैं तो बौद्धिक व मानसिक रूप से भी इंसान को मजबूती मिलती है।
