अनिल नेगी, किन्नौर: हिमाचल को देवभूमि भी कहा जाता है। यहां हर वर्ष देवी-देवताओं के अलग-अलग तरह के मेले ओर और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता रहता है। देवता को समर्पित एक ऐसे ही मेले फुलाइच की शुरुवात जिला किन्नौर में हुई है। किन्नौर के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों फुलायच मेला शुरू हुआ है। फुलायच का अर्थ फूलों का मेला है जिसमें स्थानीय ग्रामीण पहाड़ो से ब्रह्म कमल उठाकर अपने देवता को समर्पित करते है।
इन दिनों जिला के बारंग,पूंनंग,सांगला वैली, हँगरंग वैली मे फुलाइच मेला शुरू हुआ है जिसमें सभी ग्रामीण अपने स्थानीय देवताओं के मंदिर के प्रांगण में एकत्रित होते है। इस दौरान सभी ग्रामीण किन्नौर की पारंपरिक वेशभूषा पहनकर आते है और स्थानीय देवता को ऊंचे पहाड़ो से उठाकर लाए गए शुद्ध ब्रह्म कमल फूल समर्पित कर उनकी पूजा अर्चना करते है और किन्नौर के पारंपरिक मेले का ही आयोजन होता है।
जिला किन्नौर के अंदर फुलाइच मेला वर्ष में एक बार मनाया जाता है। फुलाइच मेला गांव के आपसी आमाजस्य व देव समाज को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सैकड़ो वर्ष पुराने इस मेले का उद्देश्य गांव की सुख शांति व समृद्धि के लिए होता है जिसे आज भी जिला के लोग अपने अपने ग्रामीण क्षेत्रो में अपने समय अनुसार मनाते है। इस दौरान ग्रामीण अपने खेतीबाड़ी व घर के काम छोड़कर करीब 3 से 5 दिन तक केवल फुलायच मेले का मंदिर में आनंद लेते है और इस मेले में जिला के पारंपरिक खान पान का प्रयोग किया जाता है। देवी देवता ग्रामीणों को आशीर्वाद भी प्रदान करते है।
मेले में ना आने पर लगता है जुर्माना
फुलाइच मेले मे बाहरी क्षेत्रों मे पढ़ने वाले बच्चे व नौकरी पेशा लोगों को भी मेले में आना अनिवार्य होता है। यदि कोई व्यक्ति इस मेले मे बहुत ही ज़रूरी कार्य से नहीं आता तो उसके परिवार से किसी भी सदस्य को मेले में आना अनिवार्य होता है अन्यथा मेले में शामिल नहीं होने पर स्थानीय देव समाज जुर्माना भी लगा सकता है।
