भावना शर्मा: हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के नाम से जाना जाता हैं। यहां की धरती पर अनेकों देवी-देवताओं का वास हैं। यहां के लोगों की देवी देवताओं में अटूट श्रद्धा और आस्था हैं। पहाड़ों के बीच में बसे देवी देवताओं को लेकर कोई ना कोई मान्यता ओर कहानी जरूर हैं जिसे लेकर लोगों का विश्वास आज भी उसी तरह बना हुआ हैं जैसा सदियों पहले था। ऐसा ही श्रद्धा और आस्था का प्रतीक हैं पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय उच्च मार्ग स्थित अरला से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर ग्राम पंचायत सलोह में स्थित जाहरवीर गुग्गा जी महाराज का प्राचीन मंदिर जिसमें लोगों की अटूट आस्था हैं।
मान्यता हैं कि इस गुग्गा मंदिर में सर्पदंश से पीड़ित लोग ठीक हो जाते हैं। यहां तक कि शारीरिक और मानसिक कष्ट और रोगों से ग्रसित लोग ठीक हो जाते हैं। यही वजह भी हैं कि इन्हीं मान्यताओं के चलते यह मंदिर और स्थान लोगों की अटूट आस्था का केंद्र हैं। यूं तो इस मंदिर में रोजाना ही लोगों का आना जाना लगा रहता है लेकिन साल का कुछ समय ऐसा है जब इस मंदिर में उत्सव जैसा माहौल होता है और देश भर से लोग यहां मंदिर में दर्शन करने और शीश नवाने के लिए पहुंचते हैं। जाहरवीर गुग्गा जी महाराज का प्राचीन मंदिर में हर वर्ष रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक मेले का आयोजन होता हैं। इस दौरान यहां शारीरिक और मानसिक कष्टों से ग्रसित लोगों का इलाज भी किया जाता हैं।
रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक नंगे पांव रहने के साथ जमीन पर सोते हैं मंदिर के आस-पास के लोग
जाहर गुग्गा वीर के मंदिर में रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक लगने वाले मेले के दौरान गांव सलोह और कथियाड़ा ओर आस-पास के गांव के लोग तक नंगे पांव रहते है और सोने के लिए भूमि आसन का प्रयोग किया जाता हैं 10 दिनों तक उपवास में रहते हुए न तो सिर के बाल कटवाते हैं और न ही दाढ़ी बनवाते है। मेले के दस दिनों में जाहरवीर गुग्गा जी महाराज के छत्र के साथ सभी गांवो में अढ़ाई फेरी लगाई जाती हैं जिसमें बावा जी के भक्त नंगे पांव शामिल होते हैं। इस दौरान मंदिर में उत्सव सा महौल होता है और प्रदेश के अतिरिक्त देशभर से लोग भारी संख्या में यहां पहुंचते हैं।
मंदिर प्रांगण में स्थिर प्राचीन अलिया के पेड़ से बांधने
से दूर होती हैं भूत प्रेत बाधाएं
ऐसी मान्यता है कि जो लोग भूतप्रेत इत्यादि के साये ओर अन्य बिमारियों से पीड़ित होते हैं मंदिर में माथा टेकने और दस दिनों यहां रहकर गुग्गा मंदिर के भीतर या बाहर परिक्रमा कर ग्यारवें दिन ठीक होकर अपने अपने घरों को खुशी-खुशी जाते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि आपे से बिल्कुल बाहर हो चुके लोगों को मंदिर के प्रांगण में स्थित प्राचीन अलिया नामक पेड़ से बांधने से लोग ठीक होकर कुछ ही घंटों में पीड़ित लोग ठीक होकर मंदिर की परिक्रमा करने लगते हैं।
इलाके के आसपास अगर किसी को डसे सांप तो अपने आप बजने लगता था मंदिर में रखा डोल
यह भी मान्यता है कि गुग्गा मंदिर में सांप के काटे हुए लोग भी यहां ठीक होते हैं। जाहर वीर गुग्गा जी को सर्पों का ईष्ट देव माना गया हैं। बुजुर्गों का मानना है कि इस इलाके के आस पास कहीं भी किसी को सर्पदंश होने पर मंदिर में रखा ढोल अपने आप बजने लगता था और पीड़ित व्यक्ति मंदिर में आकर बिल्कुल ठीक हो जाता था। आज भी सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति मंदिर में दस दिन रहकर ठीक होते हैं। इन्हीं दिनों में गुग्गा जी महाराज का छत्र लेकर पुजारी अपने श्रद्धालुओं सहित गांव-गांव जाकर गुग्गा जी की गाथा भी सुनाते हैं।
1898 में हुआ था मंदिर का निर्माण
जाहर गुग्गा वीर महाराज के मंदिर के इतिहास की बात की जाए तो यह मंदिर बेहद पुराना हैं। यहां के बुजुर्गों के मुताबिक वर्ष 18 स्थान में में इस मंदिर का निर्माण पुजारी पफुउ राम ने करवाया था। राजस्थान के गांव दुढेरा के रहने वाले पफुउ राम को सपने में जहरवीर गुग्गा देवता ने साक्षात दर्शन देकर कहा कि आप मेरा मंदिर कांगड़ा जिला के सलोह गांव में बनायें, ताकि वहां पर दीन दुखियों की सहायता कर सकूं। पफुउ रामजी ने सलोह में बहुत बड़ा मंदिर बनवाया और आज पफुउ राम के पौत्र इस मंदिर के पुजारी हैं।
