भावना शर्मा: धौलाधार पर्वत शृंखला के अति दुर्गम स्थल पर स्थित हिमानी चामुंडा नंदिकेश्वर धाम श्रद्धालुओं में काफी प्रसिद्ध हैं। दुर्गम स्थल पर बने माता हिमानी चामुंडा के धाम पहुंचने की राह भी बेहद कठिन हैं। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 11 किलोमीटर का पैदल सफर करना पड़ता हैं। सीधी चढ़ाई चढ़ कर भक्त यहां माता हिमानी चामुंडा के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। हालांकि बर्फबारी के चलते यह मंदिर कुछ समय के लिए भक्तों के दर्शनों के लिए बंद कर दिया जाता है लेकिन मार्च और अप्रैल माह के आते ही दोबारा से हिमानी चामुंडा माता के दर्शनों के लिए खुलता है और तब श्रद्धालु यहां की कठिन चढ़ाई चढ़कर मां चामुंडा के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं।
इस 2920 मीटर की उंचाई पर स्थित आदि हिमानी चामुंडा नंदिकेश्वर धाम में मां भगवती कन्या रूप में विराजमान हैं। माता के यहां विराजमान होने को लेकर अलग-अलग कहानियां ओर मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि इसी स्थान पर असुर जालंधर और महादेव के बीच युद्ध के दौरान भगवती चामुंडा को अधिष्ठात्री देवी और रुद्रत्व प्राप्त हुआ था। इस कारण यह क्षेत्र रुद्र चामुंडा के रूप में भी ख्याति प्राप्त हैं। मां चामुंडा यहां जालंधर पीठ के उत्तरी द्वारपाल के रूप में स्थापित हैं। जब देवासुर संग्राम हुआ तो भगवती कौशिकी ने अपनी भृकुटि से मां चंडिका को और उन्हें चंड व मुंड नाम के दैत्यों का वध करने को कहा। मां भगवती चंडिका व दैत्य चंड व मुंड के साथ भीषण संग्राम हुआ। मां ने दोनों दैत्यों का वध कर दिया और दोनों असुरों के सिरों को काटकर भगवती कौशिकी के पास ले गई। भगवती ने प्रसन्न होकर कहा कि तुमने दैत्य चंड व मुंड का संहार किया है। अब तुम संसार में चामुंडा नाम से प्रसिद्ध होंगी। तभी से कांगड़ा जिला के चामुंडा में मां चामुंडा क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं।
वहीं इस स्थल पर मंदिर निर्माण 15वीं सदी में राजा चंद्रभान ने करवाया था बताया जाता हैं। जब 1670 ई. में मुग़लो ने आक्रमण किया था तो उस समय राजा चंद्रभान इसी स्थल पर आकर छिपा था। मां की कृपा के चलते राजा ने यहां मुगलों को मार गिराया था इसके बाद पीडी सैणी ने 3 जुलाई 1993 को मंदिर का संरक्षण करना शुरू किया था दस वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद भवन निर्माण हुआ। 2003 में यहां माता की मूर्ति की स्थापना की गई थी।
जलकर राख हो गया था मंदिर
वर्ष 2014 में हिमानी चामुंडा में बनाया जा रहा नया मंदिर आग की भेंट चढ़ गया था। अभी इसका निर्माण कार्य पूरा भी नहीं हुआ था कि इस निर्माणाधीन मंदिर में आग लग गई जिससे यह जलकर राख हो गया था। अब यहां दोबारा से नए भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जा रहा हैं। अभी हां निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ हैं। इस मंदिर का निर्माण कार्य पूरा होने के बाद प्राचीन पुराने मंदिर से मां हिमानी चामुंडा की मूर्ति मंदिर में स्थापित की जाएगी।
चार माह के लिए बंद हो जाते हैं मंदिर के कपाट
धौलाधार पर्वत शृंखला के बीच बसा हिमानी चामुंडा मंदिर सर्दियों में 4 माह के लिए बंद हो जाता हैं। इसके पीछे की वजह है भारी बर्फबारी। इस स्थान पर काफी ज्यादा बर्फ गिरती हैं जिसकी वजह से सुविधाओं के अभाव के बीच यहां रह पाना और यहां जाना संभव नहीं होता । इसी के चलते इस स्थान और मंदिर कको 15 नवंबर से 15 मार्च तक बंद कर दिया जाता हैं। इसके बाद जब मंदिर खुलता है तभी पर्यटकों और स्थानीय लोगों को यहां जाने की अनुमति मिलती हैं।
लंबे समय से चल रही हैं हिमानी चामुंडा को रोपवे से जोड़ने की क़वायद
हिमानी चामुंडा मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आसानी हो इसके लिए इस स्थल को रूप से जोड़ने की कवायद भी लंबे समय से प्रदेश में चल रही हैं। पूर्व सरकार के समय में भी इस स्थान को रोपवे से जोड़ने की बात होती रही हैं अब वर्तमान कांग्रेस सरकार के समय में जब जिला कांगड़ा को पर्यटन राजधानी के तौर पर विकसित करने की बात कही गई है तो ऐसे में हिमानी चामुंडा मंदिर को रोपवे से जोड़ने की प्रक्रिया पूरी होने की आस भी लोगों के बीच जगी हैं। अगर इस स्थान तक रोपवे पहुंचता है तो लोग यहां आसानी से पहुंच पाएंगे और यहां पहुंचकर मां हिमानी चामुंडा के शक्ति स्वरुप के दर्शन कर पाएंगे।
