संजीव महाजन,नूरपुर: विधानसभा इंदौरा मुख्यालय से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित शिव मंदिर, काठगढ़ का अपना अलग महत्व हैं। शिवरात्रि के महापर्व पर, इस मंदिर में प्रदेश के अलावा सीमांत राज्यों, पंजाब एवं हरियाणा से भी असंख्य श्रद्वालु विशेष रूप से अपने भोले के दर्शन करने आते हैं। हिमालय के आंचल में बसा हिमाचल प्रदेश अपनी अलौकिक एवं मनोहारी धरती के कारण आदिकाल से ही देवी-देवताओं की प्रिय तपस्थली रहा हैं। इसी देव संस्कृति की वजह से हिमाचल को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता हैं।
देवभूमि की ऐसी ऐतिहासिक एवं समृद्ध सांस्कृतिक गौरवशाली पृष्ठभूमि को समेटे, कांगड़ा ज़िला आरंभ से ही धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा हैं। इसकी मान्यता, धारणाएं एवं परंपराएं आदिकाल से ही जनमानस में अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। ऐसा ही यह शिव मंदिर कांगड़ा के काठगढ़ में हैं।
शिवरात्रि पर इस मंदिर में श्रद्धालुओं की बम-बम भोले के जयकारों और घंटियों की आवाज से मंदिर की शोभा देखते ही बनती हैं। इस बार यहां पर ज़िला स्तरीय शिवरात्रि महोत्सव का आयोजन 17 से 19 फरवरी तक किया जा रहा हैं। यह शिव मंदिर पर्यटन की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण स्थान बन गया हैं। वर्ष 1986 से पहले, यहां केवल शिवरात्रि महोत्सव ही मनाया जाता था। अब शिवरात्रि के साथ-साथ रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, श्रावण मास महोत्सव, शरद नवरात्रि ओर अन्य सभी धार्मिक समारोह भी यहां आयोजित किए जाते हैं।
इस मंदिर के उत्थान के लिए वर्ष 1984 में प्राचीन शिव मंदिर प्रबंधन कारिणी सभा, काठगढ़ का गठन किया गया था। सन 1986 में इस सभा का पंजीकरण होने के बाद मंदिर में आने वाले श्रद्वालुओं की सुविधा के लिए कई विकास कार्य आरंभ किए गए। सभा के सदस्यों की कड़ी मेहनत और लग्न व लोगों के योगदान से सभा की ओर से वर्ष 1995 में प्राचीन शिव मंदिर के दायीं ओर भव्य श्री राम दरबार मंदिर का निर्माण करवाया गया।
मंदिर कमेटी का वर्तमान मे ज़िम्मा संभाल रहे प्रधान ओम प्रकाश कटोच बताते हैं कि श्रद्धालुओं की दिन- प्रतिदिन बढती संख्या को देखते हुए कमेटी ने लंगर हॉल, सराए भवन, भव्य सुंदर पार्क, पेयजल की व्यवस्था ओर सुलभ शौचालयों का निर्माण करवाया है। इसके अतिरिक्त सरकार ओर लोगों की सहभागिता से कमेटी की ओर से निर्माण कार्य निरंतर जारी हैं। मंदिर में आने वाले श्रद्वालुओं की सुविधा के लिए कमेटी प्रतिदिन तीन बार निःशुल्क लंगर की व्यवस्था उपलब्ध करवा रही है। इसके अलावा कमेटी समय-समय पर निःशुल्क चिकित्सा शिविरों का आयोजन भी करवा रही है ।
आदिकाल से ही यहां प्रकट हुआ हैं स्वयंभू
काठगढ़ में स्थित यह शिवलिंग आदिकाल से स्वयंभू के रूप में प्रकट हुआ हैं। सात फुट से अधिक ऊंचा, 6 फुट 3 इंच की परिधि में भूरे रंग के रेतीले पाषाण रूप में यह शिवलिंग व्यास दरिया ओर छौंछ खड्ड के संगम स्थान के दाईं ओर टीले पर विराजमान हैं। यह शिवलिंग दो भागों में विभाजित हैं। छोटे भाग को मां पार्वती ओर ऊंचे भाग को भगवान शिव के रूप में माना जाता हैं। इसे अर्धनारीश्वर शिवलिंग भी कहा जाता हैं।
घटता बढ़ता रहता हैं शिवलिंग के अर्धनारीश्वर के मध्य का हिस्सा
प्रचलित मान्यताओं के अनुसार मां पार्वती और भगवान शिव के इस अर्धनारीश्वर के मध्य का हिस्सा नक्षत्रों के अनुरूप घटता-बढ़ता रहता हैं ओर शिवरात्रि पर दोनों का मिलन हो जाता हैं। शिवलिंग के रूप में पूजन किए जाने वाले भगवान शिवलिंग की ऊंचाई लगभग 7-8 फुट हैं, जबकि मां पार्वती के रूप में आराध्य हिस्सा 5-6 फुट ऊंचा हैं। यह पावन शिवलिंग अष्टकोणीय ओर काले-भूरे रंग का हैं।
