चन्द्रिका : हिमाचल प्रदेश का जिला मंडी छोटी काशी के नाम से भी जाना जाता है । आज हम आपको मंडी के करसोग में स्थित महूंनाग मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं ।महूंनाग को दानवीर कर्ण का अवतार माना जाता है, यह मंदिर दानवीर कर्ण को समर्पित है ।मंदिर मुख्य करसोग बाजार से लगभग 25 किमी दूर है। मंदिर के चारों ओर प्राकृतिक सुंदरता और सेब के बागों की बहुतायत से भरे कई आकर्षक दृश्य हैं।
देव महूंनाग मंदिर एक साधारण शैली का पहाड़ी मंदिर है और यह भगवान कर्ण को समर्पित है, जिन्होंने महाभारत में विशेष भूमिका निभाई थी, जिन्हें स्थानीय रूप से महुनाग के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि, जब भी भक्त मुसीबत में होते हैं और वे भगवान कर्ण से मदद मांगते हैं, तो वह खुद को “महू” (मधुमक्खी) में बदल लेते हैं और उनकी मदद के लिए दौड़ पड़ते हैं। मन्दिर का निर्माण 1664 में राजा श्याम सेन द्वारा किया गया था, जो भगवान कर्ण के बहुत बड़े भक्त थे।
महूंनाग है दानवीर कर्ण के अवतार
महूंनाग को दानवीर कर्ण का अवतार माना जाता है। देव बड़ेयोगी महूंनाग के गुरु माने जाते हैं। महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने छल से कर्ण का वध तो कर दिया लेकिन अर्जुन कर्ण को मारने के बाद ग्लानी से भर गया। कहा जाता है कि अर्जुन ने अपने नाग मित्रों कि सहायता से कर्ण के श+व को लाकर सतलुज के किनारे ततापानी के पास अंतिम संस्कार किया था। उसी चिता से एक नाग प्रकट हुआ। वह नाग इसी जगह बस गया। इसी नाग देवता को लोग आज भी माहूंनाग के रूप में पूजते हैं।
महूंनाग स्वर्ण दान तो करते हैं, पर स्वर्ण श्रृंगार नहीं करते
महूंनाग के बारे में माना जाता है कि एक बार सुकेत के राजा श्याम सेन को मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने छल से दिल्ली में कैद कर लिया। वह सुकेत को अपने राजा के अधीन करना चाहता था। सुकेत के राजा श्याम सेन ने कैद से मुक्ति पाने के लिए कई देवी- देवताओं को याद किया। लेकिन कैद से निकल नहीं पाया। तब राजा ने नागराज कर्ण का स्मरण किया। माहूंनाग ने राजा को मधुमक्खी के रूप में दर्शन दिए और जल्दी ही कैद से छूटने की बात कही।राजा ने कहा कि अगर वह कैद से मुक्त हो जाएगा तो वह अपना आधा राज्य राजा कर्ण माहुंनाग को समर्पित कर देगा। इसके बाद मुग़ल सम्राट को शतरंज खेलने कि इच्छा हुई लेकिन उसे खेलने के लिए कोई खिलाड़ी नहीं मिला। तब उसने राजा श्याम सेन को खेलने के लिए कैद से मुक्त किया। उस दिन राजा श्याम सेन शतरंज में जीतता गया और अंत में उसने अपने मुक्त होने कि बाज़ी जीत ली साथ ही अपने राज्य कि और चल पड़ा।अपने वचन के अनुसार राजा ने महूंनाग को अपना आधा राज्य और 400 रूपए नगद चांदी हर साल नजराना देना तय किया। किन्तु महूंनाग ने इतना बड़ा क्षेत्र नहीं लिया और केवल माहूंनाग क्षेत्र का सीमित भूभाग ही लिया। महूंनाग स्वर्ण दान तो करते हैं पर स्वर्ण श्रृंगार नहीं करते। महूंनाग मंदिर में सवा किलो सोने का मेहरा है और चांदी के 8 छत्र हैं।
यहां हर साल मनाया जाता है 5 दिवसीय मेला
महूंनाग मंदिर करसोग से 37 किलोमीटर और शिमला से वाया तत्तापानी 80 किलोमीटर की दूरी पर है। मूल माहुंनाग का मुख्या मंदिर बखारी कोठी ग्राम पंचायत सवामाहूं तहसील करसोग में है।यहां हर साल 5 दिवसीय मेला बागड़दड में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। इस मेले के इतिहास का संबंध हिमाचल में अंग्रेजी शासन से है। महूंनाग के गुर को परीक्षा के लिए सतलुज में छलांग लगा कर सुखी रेत निकालनी पड़ती है। महूंनाग मंदिर में भक्तगण दूर दूर से अपनी मन्नतें पूरी होने पर आते हैं।
