राहुल चावला , धर्मशाला: निर्वासित तिब्बतियन महिलाओं ने अपने संघर्मयी जीवन के इतिहास के पन्नों को बदलते हुए फिर से रविवार के ही दिन घटित हुई उस घड़ी को याद करते हुए चीन के ख़िलाफ़ धर्मशाला की ग्लोवल सिटी के मैकलोड़गंज में प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में शामिल हुईं तिब्बतियन महिलाओं ने आरोप लगाया कि चीन की विस्तारवादी नीति के खिलाफ वो इसी तारीख यानी 12 मार्च 1959 को तिब्बत के पोटाला में एकत्रित होकर अपने भविष्य की रणनीति पर गहनता के साथ विचार-विमर्श कर रही थी। बेहद शालीन तरीके से चीन का बहिष्कार करते हुए गो बैक चाइना के नारे लगा रही थी मगर चीन की अत्ताताई शक्तियों ने उस दिन उन महिलाओं का बड़ी ही निर्दयता के साथ दमन कर दिया थ। कई महिलाओं को जेलों में ठूंस दिया तो कईयों की हाल बदतर हो गई। नतीजतन वहां स्थिती आज भी ज्यों की त्यों बरकार है, वहां लगातार आज भी महिलाओं का शोषण हो रहा हैं।
चीन वहां की महिलाओं के मानव अधिकारों का लगातार हनन कर रहा है, उनके ख़िलाफ़ आवाज बुलंद करने वालों को जेलों में ठूंसा जाता है या उनकी आवाज़ को सदा के लिए ख़ामोश कर दिया जाता हैं। निर्वासित तिब्बतियन विमेन एसोसिएशन की संयुक्त सचिव ल्हामो तुंझुम ने कहा कि वो आज भी तिब्बत की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं जिसके लिए उन्होंने बौद्ध धर्मगुरु दलाईलामा के मध्यवर्गी रास्ते शांति और अहिंसा का मार्ग अपनाया हुआ हैं, जिसके तहत दुनियाभर में चाइना का विरोध किया जा रहा हैं। यह प्रदर्शन भी उसी खिलाफत का हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा कि हमारी मांग यह है कि हमें चीन की सरकार से वहां और कुछ नहीं चाहिए बल्कि तिब्बत के जीवन की जो मूल शैली है जिसमें उनकी भाषा, बोली, परंपराएं, विरासत, संस्कृति और सभ्यता शामिल हैं उसे नुकसान न पहुंचाकर उसे यथावत सुचारू रखा जाए। यहां तक कि उसे सहेजने की उन्हें अनुमति दी हैं। .इसके अलावा आधारभूत मानव अधिकार भी उन्हें चाहिए जो कि तिब्बत के अंदर उनसे छीन लिए गए है।गुजरे 6 दशक से हम अपनी आवाज़ दुनियाभर में बुलंद कर रहे हैं जिसको निश्चित तौर पर चाइना सुन रहा हैं हां मगर उस पर वो एक्शन लेता हुआ कुछ नजर नहीं आ रहा हैं। फिर भी उन्हें पूर्ण विश्वास है कि एक न एक दिन उनकी आवाज़ चीन जरूर सुनेगा और उनके अधिकार उन्हें जरूर मिलेंगे।
