मंडी : धर्मवीर (TSN)- आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी सरकारें महान स्वतंत्रता सेनानी व महान क्रांतिकारी भाई हिरदाराम को आज दिन दिन तक कोई भी सम्मान नहीं दे पाई है। जबकि इस स्वतंत्रता सेनानी ने वीर सावरकर के साथ अंडमान निकोबार में काले पानी की सजा काटी। भाई हिरदा राम को अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की तरह सम्मान मिले और उनके नाम पर ट्रस्ट बनाने के लिए सरकार जमीन भी मुहैया करवाए। यह मांग भाई हिदाराम की 137वीं जयंती पर मंडी वासियों ने की है।
भाई हिरदाराम की यह जयंती मंडी शहर की इंदिरा मार्किट की छत पर स्थापित उनकी प्रतिमा के पास मनाई गई। वरिष्ठ साहित्यकार एवं लेखक कृष्ण कुमार नूतन सहित नगर निगम के महापौर वीरेंद्र भट्ट, उपमहापौर माधुरी कपूर और भाई हिरदा राम के पौत्र शमशेर सिंह मिन्हास सहित परिवार के सदस्यों और अन्य गणमान्य लोगों ने भाई हिरदा राम की प्रतिमा पर माल्यापर्ण करके उन्हें याद किया और श्रद्धांजलि अर्पित की। वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण कुमार नूतन ने अपने संबोधन में कहा कि देश को आजादी दिलाने में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले महान स्वतंत्रा सेनानी को सरकारें आज दिन तक ताम्रपत्र जैसा सम्मान नहीं दे पाई। मंडी जिला के लोग अपने इस महान सपूत के लिए इस सम्मान की वर्षों से मांग कर रहे हैं और सरकार को इस मांग को जल्द से जल्द पूरा करना चाहिए।
भाई हिरदा राम के पौत्र शमशेर सिंह ने कहा ये
इस मौके पर भाई हिरदा राम के पौत्र शमशेर सिंह मिन्हास ने बताया कि वे अपने दादा भाई हिरदा राम के नाम से एक ट्रस्ट का संचालन करना चाहते हैं। यदि सरकार इस ट्रस्ट के लिए जमीन उपलब्ध करवाती है तो लोगों के सहयोग से इसका संचालन किया जाएगा और इसके माध्यम से लोगों की मदद और सेवा की जाएगी।
कौन थे भाई हिरदा राम
भाई हिरदाराम महान स्वतंत्रता सेनानी व क्रांतिकारी थे जिन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी अहम भूमिका निभाई। उनका जन्म 28 नवंबर 1885 को मंडी में हुआ। भाई हिरदा राम गदर पार्टी के प्रमुख सदस्य थे और उन्हें लाहौर बम कांड में अंग्रेजी हकुमत द्वारा फांसी की सजा दी गई थी जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया था। भाई हिरदा राम को अंडेमान निकोबार की जेल में काले पानी की सजा दी गई जहां उन्हें कई प्रकार की यातनाएं सहन करनी पड़ी। सजा काटने के बाद उन्हें 1929 को रिहा किया गया था लेकिन इसके बाद भी इन्हें अपने घर नहीं जाने दिया गया था। देश की आजादी के बाद वे अपने घर मंडी वापिस आ सके थे। 21 अगस्त 1965 को उनका देहांत हो गया था।
