संजीव महाजन, नूरपुर: हिमाचल प्रदेश जैसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यहां अनेक देवी देवताओं का वास है और अनेकों प्रसिद्ध मंदिर है जो अपना एक अलग ही इतिहास संजोए हुए है। ऐसा ही एक शिव मंदिर जिला कांगड़ा उपमंडल इंदौरा की उपतहसील गंगथ में स्थित है। इस मंदिर में भगवान शिव का सफेद शिवलिंग है जो अपने आप में अनूठा है ओर इसके दर्शन मात्र से जीवात्मा का कल्याण होता है और भोले बाबा अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं। ऐसी मान्यता है कि उक्त सफेद शिवलिंग भारत वर्ष में एक ही है जो कि हिमाचल के गंगथ में है।
यह मंदिर जसूर इंदौरा मार्ग पर गंगथ बस स्टॉप से बाजार के मध्य भाग यानी आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थापित है। यूं तो साल भर भक्तों का यहां आना जाना लगा रहता है लेकिन सावन माह में इस सफेद शिवलिंग के दर्शन , पूजा-अर्चना और जलाभिषेक का अपना ही एक अलग महत्व है। मान्यता है कि सावन माह में जो भक्त इस शिवलिंग की पूजा-अर्चना करता है उसे बाबा अमरनाथ के दर्शनों के समान पुन्य प्राप्त होता है । उक्त मंदिर कस्बा के पुराने बाजार के बीचोबीच मंदिर में सुशोभित है। आकार में 20 इंच ऊंचा , 52 इंच गोलाकार और एक हजार लुदरी (रुद्री ) वाला यह ऐतिहासिक सफेद शिवलिंग अपने आप में इतिहास की यादों को संजोते हुए है। यह मंदिर गंगथ और आसपास के क्षेत्र के लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है जिसे वर्तमान में चांदी की परत से सजाया गया है ।
मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी देते हुए दिनेश शर्मा ने बताया कि उक्त शिवलिंग 1641 ईस्वी में नूरपुर के राजा जगत सिंह के माओ गढ़ किले में स्थापित था जोकि वर्तमान में नूरपुर की बरंडा पंचायत के घने जंगल में पड़ता है उस किले के अब भी अवशेष मौजूद है। राजा जगत सिंह भगवान भोले नाथ के अनन्य भक्त थे उन्होंने किले के बीच इस शिवलिंग को प्रतिष्ठापित किया था और नित्य प्रति बाबा की पूजा अर्चना करते थे जिसके चलते बाबा भोले नाथ की उनके ऊपर असीम कृपा थी । 1641 इस्बी में माओ गढ़ पर एक बार अचानक मुगलों ने जोरदार आक्रमण कर किले को ध्वस्त कर दिया तो यह शिवलिंग उस किले के मलबे में ही समाहित हो गया था । कालांतर में इंदपुर गांव के कटोच परिवार के बाबा मग्गो को एक बार भगवान शिव ने स्वपन में आकर उस किले में समाहित होने का दर्शन करवाया तो बाबा मग्गो और गांव वालों ने भगवान शिव का आदेश मानकर जब माओ गढ़ के किले में स्वपन में दिखी भूमि की खुदाई शुरू की तो खुदाई के दौरान जैसे ही फावड़ा इस शिवलिंग से टकराया तो उसमें से दूध की धारा बह उठी थी। फावड़े से टकराने के निशान आज भी उक्त शिवलिंग में दिखाई देते हैं तब लोगों ने इस शिवलिंग को भूमि से निकालकर पालकी में विराजमान कर इन्दपुर को ले जाते समय जब कुछ पल के लिए गंगथ में विश्राम के लिए रुके लेकिन कुछ पल के विश्राम के बाद जब दोबारा पालकी को उठाना चाहा तो पालकी हिलाई तक नहीं गई तब लोगों ने भगवान शिव की इच्छा को शिरोधार्य कर इस शिवलिंग को यहीं स्थापित कर दिया था जो आज भी बाजार के मध्य भाग विराजमान है जोकि क्षेत्र के लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है क्षेत्र के अनेक नए मंदिरों में स्थापित किए जाने वाले शिवलिंगों को इस शिवलिंग का स्पर्श करवाकर ही प्रतिष्ठापित किया जाता है, लेकिन सावन माह में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है । मंदिर समिति के सदस्य पंडित दिनेश शर्मा ने बताया कि हर बर्ष की भांति इस बार भी सावन माह में भक्तों की आवाजाही मंदिर में हो रही है और भक्त बडी श्रद्धा से भोले बाबा की पूजा अर्चना कर रह स्वयं को धन्य कर रहे है।
एक लोटा जलभिषेक करने से मिलता है एक हजार लोटे का जलाभिषेक करने जितना मिलता है फल गंगथ में स्थित शिव मंदिर को एक हजार लुदरी ( रुद्री )मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इसका नाम ही इस मंदिर की विशेषता को दर्शाता है। इस मंदिर में शिवलिंग पर एक लोटे का जलाभिषेक करने से हज़ार लोटे जलाभिषेक करने का फल प्राप्त होता है।
भगवान शिव ने सूखे से जताई है निज़ात
एक बार क्षेत्र में भयंकर सूखा पड़ा था तो लोगों ने समूह बनाकर साथ लगती छोंछ खड्ड से बाबा भोले का जलाभिषेक किया था तो आसमान से बादल बरस पड़े थे और क्षेत्र के लोगों को सूखे से राहत मिली थी। ऐसे में स्थानीय लोगों की आस्था है कि भगवान शिव की कृपा इस इलाके पर है और भगवान शिव यहां के लोगों की रक्षा करते है।
