सचिन शर्मा,मनाली(TSN): हिमाचल को देवभूमि के नाम से जाना जाता हैं और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखने को मिलता है अंतराष्ट्रीय कुल्लू के दशहरे में। इस दशहरे में सैकड़ों की संख्या में देवी देवता एक जगह पर आ कर भक्तों को दर्शन देते हैं। कुल्लू घाटी में दशहरे के पर्व का संस्कृति एवं ऐतिहासिक महत्व हैं। हिमाचल प्रदेश के जिला कुल्लू में दशहरा एक दिन का नहीं बल्कि सात दिन का त्यौहार है और इसकी विशेषता यह है कि जब पूरे भारत वर्ष में दशहरा खत्म हेाता है तब कुल्लू दशहरे का शुभारंभ होता हैं।
दशहरे में घाटी के सभी देवी देवता सैकड़ों की संख्या में भाग लेते है और सभी देवी देवताओं की इस महाकुंभ में अहम भूमिका रहती हैं। इन्हीं में से एक है पर्यटन नगरी मनाली की आराध्य देवी माता हडिंबा। माता हडिंबा की दशहरे में अहम भूमिका रहती हैं। माता हडिंबा को राजघराने की दादी भी कहा जाता हैं। कुल्लू दशहरा देवी हडिंबा के आगमन से शुरू होता हैं। पहले दिन देवी हडिंबा का रथ कुल्लू के राजमहल में प्रवेश करता हैं। यहां माता की पूजा अर्चना के बाद रघुनाथ भगवान को भी ढालपुर में लाया जाता हैं। जहां से सात दिवसीय दशहरा उत्सव शुरू हो जाता है और माता अगले सात दिनों तक अपने अस्थाई शिविर में ही रहती है और लंका दहन के बाद ही अपने देवालय वापिस लौटती हैं। कल से शुरू होने वाले देव महाकुंभ के लिए आज देवी हडिंबा अपने कारकूनों वह हरियानों के साथ दशहरे में भाग लेने के लिए अपने स्थान मनाली से निकल पड़ी हैं।
हडिंबा माता के विशेष व्यक्ति देवी चंद ने बताया की माता आज रात कुल्लू पंहुचेगी और कल प्रात: देवी हडिंबा जब कुल्लू पंहुचेगी तो वंहा पर देवी मां हडिंबा का स्वागत किया जाएगा और फिर वहां पर भगवान रघुनाथ जी की छडी माता को लेने के लिए रामशिला नामक स्थान पर लाई जाएगी जंहा से फिर माता भगवान रघुनाथ के मंदिर के प्रस्थान करेंगी। माता के वहां पर पंहुचने पर पूरे रिति रिवाज से माता की पूजा अर्चना की जाएगी। इसके बाद ही भगवान रद्युनाथ अपने मंदिर से बाहर आऐंगे और फिर भगवान रघुनाथ और सभी देवी देवता रथ मैदान के लिए रवाना होंगे जहां से भगवान रघुनाथ की शोभायात्रा आरंभ होनी है और उसके बाद कुल्लू दशहरे या फिर हम कहें देव महाकुंभ का आगाज होगा ।
