कुल्लू: आयोध्या से कुल्लू लाए गए भगवान रघुनाथ जी का देवभूमि कुल्लू से अटूट व गहरा नाता है। कुल्लू दशहरा का इतिहास साढ़े 300 साल से अधिक पुराना है। दशहरा के आयोजन के पीछे भी एक रोचक घटना का वर्णन मिलता है। कुल्लू दशहरा पूरे भारत में प्रसिद्ध है। अन्य स्थानों की ही भांति यहां भी दस दिन अथवा एक सप्ताह पूर्व तैयारी आरंभ हो जाती है। इसका आयोजन 17वीं सदी में कुल्लू के राजा जगत सिंह के शासनकाल में आरंभ हुआ।

332 देवी-देवताओं को भेजा बुलावा
बता दें कि 3 साल बाद दशहरा के हो रहे भव्य आयोजन को जिलावासियों के साथ देव समाज को बेसब्री से इंतजार है। 5 अक्टूबर से 11 तक अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव को लेकर देव समाज ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। देवी-देवताओं को दशहरा उत्सव समिति ने निमंत्रण पत्र भेज दिए हैं। दशहरा उत्सव समिति ने दशहरा के लिए रिकार्ड 332 देवी-देवताओं को बुलावा भेजा है। ऐसे में देवी-देवताओं के कारकून देवी-देवताओं के मुख मोहरों, ढोल नगाड़ों और अन्य वाद्य यंत्रों की मरम्मत कर रहे हैं।

जयराम ठाकुर की अध्यक्षता में होगी दशहरा की बैठक
माता हिडिंबा, बिजली महादेव के साथ बाह्य सराज के अधिष्ठाता खुडीजल, टकरासी नाग, ब्यास ऋषि, कोट पझारी, चोतरू नाग, देवता चंभू, सप्त ऋषि, शेष नाग ने दशहरा में आने की हामी भर दी है। भगवान रघुनाथ की अध्यक्षता वाले दशहरा उत्सव में साल दर साल देवी देवताओं की संख्या में वृद्धि हो रही है। बता दें कि दशहरा की बैठक शिमला में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की अध्यक्षता में होगी।

