ऊना: हिमाचल में वैसे तो कई धार्मिक स्थल हैं इनमें से एक है उत्तरी भारत के सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थल डेरा बाबा रुद्रानंद। यहां देश-विदेश से कई पर्यटक आते हैं। खास बात यह है कि यहां अब पंचभीष्म मेला शुरू हो रहा है। मेले में आस्था और श्रद्धा का खूब जनसैलाब देखने को मिलेगा। डेरा बाबा रुद्रानंद देश कही नहीं बल्कि विदेश में रहने वालों की भी आस्था का केंद्र है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जहां पर पांच ऋषियों ने तप करते हुए जीवित समाधि ली थी जिसके बाद जहां पर पांच पीपल प्रकट हुए। इन पीपल के पेड़ों के नीचे ही बाबा रुद्रानंद ने तप किया था। वहीं डेरा बाबा रुद्रानंद में पिछले 170 सालों से अखंड धूना निरंतर जल रहा है। इस आश्रम का प्रमुख देवता अग्रिदेव है। इस अखंड धूने की विभूति के सेवन से कई रोग ठीक हो जाते हैं।
अखंड धूने की विभूति को लोग मानते हैं चमत्कार
अखंड धूने को 1850 में बाबा रुद्रानंद जी ने बसंत पंचमी के दिन अग्नि देव की साक्षी में स्थापित किया था। अखंड धूने से देश-विदेश के लाखों लोगों की आस्था जुड़ी है। इस धूने में हर रोज वैदिक मंत्रों से हवन डाला जाता है। अखंड धूने की विभूति को लोग चमत्कारिक मानते हैं। डेरा बाबा रुद्रानंद आश्रम नारी के प्रांगण में विद्यमान पांच पीपल कोई साधारण वृक्ष नहीं हैं। इस दिन सन 1864 योगीराज श्री रुद्रानंद जी महाराज द्वारा सदा व्रत लंगर की स्थापना की गई थी। यह अटूट लंगर तब से आज तक निर्वात चलता आ रहा है। इस दिन खिचड़ी और मक्की का भोग लगाया जाता है।
इस स्थान पर एक संत भवानी गिरी जी महाराज तथा उनके चार शिष्यों ने जीवित समाधि ले ली थी। वहीं पर ही 5 पीपल हैं, जिनकी परिक्रमा करने से दिमाग के रोगी और सर्प दंश के रोगी ठीक हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है। आश्रम में प्राचीन काल से संस्कृत महाविद्यालय चल रहा है जिसमें ब्राह्मण विद्यार्थियों को वेद मंत्रों का ज्ञान दिया जाता है। आश्रम का एक ट्रस्ट भी है जो महाराज की देखरेख में कार्य को चला रहा है। इसके बाद ब्राह्मण कोटी गायत्री जप के लिए बैठ गए। इन ब्राह्मणों द्वारा विश्वशांति के लिए कोटी गायत्री महायज्ञ किया जाएगा। 6 नवंबर को अरणी मंथन महाराज श्री के कर कमलों द्वारा किया जाएगा। पूर्ण आहुति 11 नवंबर को होगी। 12 नवंबर को विशाल भंडारे का आयोजन होगा, जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु पावन धूने पर माथा टेकने के बाद महाराज श्री के दर्शन करेंगे। इस संस्कृत संस्थान की स्थापना 1905 में श्री 1008 परमानंद जी महाराज ने की थी। इस पावन तीर्थ पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था है और इन नौ दिनों में हजारों श्रद्धालु यहां ठहरेंगे।

