चन्द्रिका -हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी में रिवालसर स्थान हिन्दू,सिख व बौद्ध तीनो धर्मों का आस्था का केंद्र है। वहीं यहां रिवालसर झील एक अद्भुत झील हैं,इस झील को तैरते हुए टापुओं की झील भी कहते हैं । यह झील मंडी में पर्यटकों का आकर्षण केंद्र है, जो समुद्र स्तर से 1350 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। रिवालसर में सन 1665 ई में गुरु गोविन्द सिंह ने यात्रा की थी, यह लोमष ऋषि की तपोस्थली भी रही है । वहीं बौद्ध धर्म के लोग रिवालसर झील को पद्माचन और तिब्बती समुदाय में छो पद्मा के नाम से प्रसिद्ध है । रिवालसर झील पर अकसर मिट्टी के टीले तैरते हुए देखे जा सकते हैं, जिन पर सरकण्डों वाली ऊँची घास लगी होती है।
यह स्थान महर्षि लोमश की तपोभूमि
रिवालसर स्थान को महर्षि लोमश की तपोभूमि भी कहा जाता है। रिवालसर में भगवान कृष्ण, शिव जी और लोमश ऋषि के मंदिर हैं। प्रायश्चित के तौर पर लोमश ऋषि ने शिव जी के निमित्त रिवालसर में तपस्या की थी। रिवालसर झील में सात टापू हैं और मान्यता है कि उन पर उगी घास पर देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं।
बौद्ध गुरु के लिए बनाई चिता, जो बन गई झील
रिवालसर बौद्ध धर्म के लोगो की भी आस्था से जुड़ा स्थल हैं । कहा जाता है कि मंडी के राजा अर्शधर की पुत्री गुरु पद्मसंभव की तरफ आकर्षित हो गई थी और जब यह बात राजा को पता चली तो उसने गुरु पद्मसंभव को आग में जला देने का आदेश दे दिया था। उनके लिए बहुत बड़ी चिता बनाई गई, जो सात दिन तक जलती रही ,लेकिन सात दिन के बाद भी यह चिता गुरु पद्मसंभव को जला नही पायी ।इससे वहाँ एक झील बन गई, जिसमें से एक कमल के फूल में से गुरु पद्मसंभव एक सोलह साल के किशोर के रूप में प्रकट हुए।
गुरु गोविंद सिंह भी आए थे इस स्थान पर
रिवालसर में गुरूद्वारा भी है, जिसे मण्डी के राजा जोगेन्द्र सेन ने बनवाया था। कहा जाता है कि गुरु गोविंद सिंह ने मुग़ल साम्राज्य से लड़ते हुए सन् 1738 में रिवालसर झील के शांत वातावरण में कुछ समय बिताया था। बैसाखी के अवसर पर श्रद्धालु यहाँ स्नान के लिए आते हैं।
