राहुल चावला , शाहपुर: सावधानी हटी दुर्घटना घटी अमूमन मुख्य सड़क मार्गों पर इस तरह के स्लोगन पढ़ने को मिल जाते है। यह इसलिए क्योंकि कई परिवार आज भी सड़क दुर्घटनाओं का ही शिकार होकर मजलूम और लाचारी की जिंदगी गुजर-बसर करने को मजबूर हैं। ठीक ऐसा ही मामला शाहपुर की भत्तला पंचायत से भी सामने आया है। यहां एक नौजवान युवा सड़क दुर्घटना का ऐसा शिकार हुआ की पहाड़ जैसी जिंदगी उनके लिए अभिशाप बनकर रह गई है।
शाहपुर की भत्तला पंचायत के धयाल गांव स्थित अपने घर की चारदिवारी के अंदर बिस्तर पर मजलूमों की मानिंद, हर रोज होते दिन और रात को ज़हन में गिनता और पत्थरा चुकी आंखों से अपनी और अपने परिवार की मौजूदा हालत पर चिंता ज़ाहिर करता ये नौजवान रविंद्र कुमार है,जिसका आज से पांच साल पहले एक सड़क दुर्घटना में न केवल घर-परिवार को उंचाइयों पर ले जाने का सपना चकनाचूर हो गया था बल्कि जिन कदमों की बदौलत उसे उंचाइयों पर पहुंचने की उम्मीद थी उस हादसे ने इनसे वो भी छीन लिए। नतीजतन आज इसके अपने भी इनसे अलग हो चुके हैं और आज यह अपनी धर्मपत्नी और मासूम बच्चे के साथ खुद के तत्कालीन बनाए हुए मकान में सिसकने-सुबकने को मजबूर है।
दरअसल रविंद्र कुमार एक पढ़े-लिखे नौजवान है। डिग्री कॉलेज़ धर्मशाला से ग्रेजुएट रविंद्र कुमार ने औरों की तरह रोजगार के लिए सरकार, प्रशासन को कोसने की बजाय खुद की टैक्सी लेकर पहले खुद का नया घर बनाया। फिर दुल्हन लाए और आगे बढ़ने का सपना संजोया। मगर होनी को कुछ और ही मंजूर था और सड़क दुर्घटना में इन्होंने अपने दोनों पैरों को खो दिया, नतीजतन आज रविंद्र चलने फिरने के काबिल नहीं है।
रविंद्र चल फिर नहीं सकते है तो कोई काम भी वो नहीं कर पाते है जिससे कि उनके परिवार का गुजर बसर हो सके। ऐसे में अब घर-परिवार चलाने के लिए वह सरकार-प्रशासन के मोहताज़ है। रविंद्र लगातार गुहार लगा रहे हैं कि वो तो चलने फिरने से रहे मगर उनकी धर्मपत्नी को अगर सरकार करुणामूलक आधार पर दो पैसों पर समायोजित कर दे तो उनका तिल-तिल टूट रहा घर फिर से बस सकता है।
कहने को जिंदगी बेहद अनमोल है, मगर अनमोल जिंदगी अगर इस तरह से किसी अनहोनी का शिकार होकर घर की चारदिवारी पर मजलूमों की मानिंद सिमट जाए, तो उसे फिर अनमोल बनाने के लिए किस पायदान, पटरी या सीढ़ी का सहारा लिया जाए ये कोई बताने नहीं आता, ऐसे में अमूमन आम आदमी की नजर उनके उन नुमाइंदों पर होती है जब वो पांच साल में एक बार वोटों को गिनते हुए उनकी चौखटों पर आकर उनके उज्जवल भविष्य के सब्जबाग दिखा जाते है। अब लाचार रविंद्र और उसका छोटा सा घर संसार भी आज उसी सब्जबाग को हरा होने की उम्मीद लगाए बैठा है,। उन्हें उम्मीद है कि हमारी इस पहल पर गौर करते हुए वो लोग जरूर इस परिवार के लिके स्वरोजगार का रास्ता अख्तियार करेंगे जो पांच साल में एक बार इनकी चौखट पर दर्शन देते है।
रविंद्र को अब अपने परिवार के गुजर बसर के लिए सरकार से ही उम्मीद ओर आस है। उनका कहना है की वो तो चल फिर नहीं सकते ऐसे में घर चलाना उनके बस में नहीं है लेकिन उनकी पत्नी को अगर सरकार कि तरफ से कोई मदद मिल जाये तो उनके टूटे हुए घर संसार को बचाने के लिए यह सहारा किसी तिनके से कम नहीं होगा, लेकिन अब देखना यह है कि सरकार के दावों ओर हकीकत में कितना फर्क हैं और अब रविंद्र की अंधेरे जीवन में सरकार की हक़ीक़तों का उजाला हो पाएगा।
