संजु चौधरी, शिमला: देव भूमि हिमाचल में देवी देवताओं से जुड़ी कई कहानियां, परंपराएं,मान्यताएं ओर आस्थाएं हैं जिससे लोग आज भी जुड़े हुए है। यहां हर साल कई मेले और त्यौहार देवी देवताओं के नाम पर मनाए जाते हैं और यह त्यौहार और परंपराएं सदियों पुरानी है जिन का निर्वहन आज की पीढ़ी भी लगातार उसी तरह से करती आ रही है जिस तरह से उनकी पूर्वज इन परंपराओं को निभाया करते थे। इसी का एक साक्षात उदाहरण शिमला से 30 किलोमीटर दूर धामी के हलोग में दीपावली से अगले दिन देखने को मिलता है। जहां एक अनोखा मेला लगता है जिसे पत्थर का मेला या खेल के नाम से जाना जाता है ।

आज मंगलवार को भी यह मेलाधामी के हनोग में मनाया गया जहां मेले में दो समुदायों के बीच पत्थरों की जमकर बरसात हुई। ये सिलसिला तब तक जारी रहा जब तक कि एक पक्ष में से कोई व्यक्ति लहूलुहान नहीं हो गया। पत्थरों के मेले में करीब 15 मिनट तक कटेडू और जमोगी राजवंश के लोग एक-दूसरे पर पत्थर मारते रहे। इसमें जमोगी राजवंश के अर्जुन को पत्थर लगा। अर्जुन परोई गांव के रहने वाले हैं। इस बार कटेडू राजवंश के लोग विजयी रहे। व्यक्ति के पत्थर से खून निकलने के बाद ही पत्थरों की बरसात बंद की गई। इसके बाद खून से मां भद्रकाली को तिलक लगाया गया। पत्थर के इस खेल में दोनों ओर से लगातार छोटे और बड़े पत्थर लगातार बरसाए गए। खून निकलने के साथ ही दोनों ही तरफ से पत्थर बरसाने का सिलसिला थम गया।

मेला कमेटी के आयोजकों के साथ राजवंश के सदस्यों ने मेला स्थल के नजदीक बने मंदिर में जाकर पूजा अर्चना की। इस मेले को देखने हर साल धामी और आस पास के इलाकों से हज़ारों की तादात में लोग इस परम्परा के गवाह बनते हैं ये पत्थरबाजी तब तक यूं ही चलती रहती है जब तक इसमें किसी के सर से खून ना निकल जाए । इसके बाद घायल युवक को पहले इलाके के चौराहे पर बने सत्ती के समारक पर लेजाकर उसका रक्त बतौर भेंट चढ़ाया जाता है जिसके बाद उसी व्यक्ती को इलाके के काली मां के मंदिर लेजाकर माँ को तिलक लगाकार उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है । हैरानी की बात ये है कि घायल व्यक्ती को इस दौरान ज़रा भी दर्द महसूस नहीं होती। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में सैंकड़ो की संख्या में लोग धामी मैदान में शामिल हुए। धामी रियासत के राजा पूरे शाही अंदाज में मेले वाले स्थान पर पहुंचे।

माना जाता है कि पहले यहां हर वर्ष भद्रकाली को नर बलि दी जाती थी, लेकिन धामी रियासत की रानी ने सती होने से पहले नर बलि को बंद करने का आदेश दिया था। इसके बाद पशु बलि की शुरुवात यहां हुई लेकिन कई दशक पहले इसे भी बंद कर दिया गया। इसके बाद यहां पत्थर का मेला शुरू किया गया। मेले में पत्थर से लगी चोट के बाद जब किसी व्यक्ति का खून निकलता है तो उसके रक्त से मां भद्रकाली का तिलक किया जाता है। राजवंश व लोगों का तो ये भी कहना है कि आज तक पत्थर लगने से किसी की जान नहीं गई है। पत्थर लगने के बाद मेले को बंद कर सती माता के चबूतरे पर खून चढ़ाया जाता है, साथ ही जिसको पत्थर लगता है उसका इलाज साथ लगते अस्पताल में करवाया जाता है। राज परिवार में यदि मौत भी इस दौरान हो जाए तो पहले मेले की रस्म निभाई जाती है उसके बाद दाह संस्कार किया जाता है। इलाके के राजघराने से ताल्लुक रखने वाले राजा जगदीप सिंह का कहना है कि परम्परा अजीब है लेकिन लोगों की आस्था उससे भी बड़ी है।
