भावना शर्मा: हिमालय की गोद में बसा हिमाचल प्रदेश अपनी खूबसूरती के लिए नहीं बल्कि यहां के धार्मिक स्थलों के लिए भी विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। वहीं बात अगर प्रदेश की कांगड़ा घाटी की की जाए तो यह घाटी शक्तिपीठों के साथ ही प्राचीन शिवालयों की घाटी भी हैं। इसी घाटी में अनेक प्राचीन शिवालय विद्यमान हैं और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं, जो इनकी महत्वता को और ज्यादा बढ़ा देती हैं। इसी तरह का एक शिवालय कांगड़ा जिला के बैजनाथ क्षेत्र में विद्यमान हैं। इस स्थल को शिव धाम के नाम से भी जाना जाता हैं और यहां भगवान शिव का भव्य प्राचीन मंदिर हैं। यही वजह है कि इस स्थान पर शिवरात्रि का महापर्व भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता हैं।
बैजनाथ में शिवरात्रि के पर्व पर राज्य स्तरीय मेले का आयोजन होता है जिसकी शुरुआत है इस बार 18 फरवरी से होगी और यह 22 फरवरी तक चलेगा। इस स्थान की भव्यता और इसकी मान्यता इतनी अधिक है कि लोग यहां ना केवल प्रदेश से बल्कि प्रदेश के अलावा बाहरी राज्यों से भी भगवान शिव के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। मान्यता हैं कि इस मंदिर में प्राचीन शिवलिंग के दर्शन करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता हैं।
जनश्रुति के अनुसार बैजनाथ शिव मंदिर में विशेषकर महाशिवरात्रि पर्व पर दर्शन करने का विशेष महत्व हैं। शिवरात्रि पर्व पर इस मंदिर में प्रातः से ही भोलेनाथ के दर्शन के लिए हजार लोगों का तांता लगा रहता हैं। इस दिन मंदिर के बाहर बहने वाली बिनवा खड्ड पर बने खीर गंगा घाट में स्नान का भी विशेष महत्व हैं। श्रद्धालु यहां स्नान करने के बाद शिवलिंग को पंचामृत से स्नान करवा कर उस पर बेलपत्र, फूल भांग, धतूरा इत्यादि अर्पित कर भोले बाबा को प्रसन्न करके अपने कष्टों का निवारण करते हैं।
कथाओं के अनुसार यह हैं मंदिर का भव्य इतिहास
बैजनाथ शिव मंदिर के भव्य इतिहास की बात की जाए तो पौराणिक कथा के अनुसार त्रेतायुग में लंका के राजा रावण ने कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। तपस्या करने पर भी जब रावण को कोई फल ना मिला तो रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपना एक-एक सर काटकर हवन कुंड में आहुति देकर भगवान शिव को समर्पित करना शुरू कर दिया। जब रावण अपना अंतिम सर काट कर हवन कुंड में आहुति देने वाला था तभी भगवान शिव ने प्रसन्न होकर रावण को दर्शन दिए। भगवान शिव ने रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर ना केवल उसके 10 सर वापस जोड़ कर उसे दशानन नाम दिया बल्कि रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वर मांगने को भी कहा।
इस पर रावण ने भगवान शिव को शिवलिंग के रूप में उसके साथ लंका चलने का आग्रह किया। भगवान शिव ने भी रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवलिंग रूप में उसके साथ चलने को लेकर हामी भरी लेकिन साथ ही यह शर्त भी रखी कि वह इस शिवलिंग को रास्ते में कहीं पर भी जमीन पर ना छोड़े अगर उसने शिवलिंग जमीन पर छोड़ा तो यह शिवलिंग उसी जगह पर स्थापित हो जाएगा और उसके बाद चाह कर भी उस शिवलिंग को संस्थान से नहीं उठाया जा सकेगा।
रावण शिव ने अपनी शिवलिंग स्वरूप चिन्ह के रूप में दोनों शिवलिंग लेकर लंका के लिए निकल पड़ा। रास्ते में गोकर्ण क्षेत्र यानी बैजनाथ पहुंचने पर रावण को लघुशंका का आभास हुआ। रावण ने यहां पर खेतों में काम कर रहे एक बैजू नाम के ग्वाले को शिवलिंग पकड़ा दिया और स्वयं लघुशंका के लिए चला गया। शिवजी की माया के कारण बैजू शिवलिंग के अधिक भार नहीं सहन सका और उसने इसे शिवलिंग को धरती पर रख दिया। इस तरह दोनों शिवलिंग बैजनाथ में स्थापित हो गए। जिस मंजूषा में रावण ने दोनों शिवलिंग रखे थे उस मंजूषा के सामने जो शिवलिंग था वह चंद्रताल के नाम से प्रसिद्ध हुआ और जो पीठ की ओर था वह बैजनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बैजनाथ मंदिर के सामने आज भी कुछ छोटे मंदिर ओर नंदी बैल की मूर्ति हैं, जहां पर भक्तगण नंदी के कान में अपनी मनौती पूरी होने की कामना करते हैं।
पांडवों ने किया था मंदिर का निर्माण
कहा जाता हैं कि इस बैजनाथ मंदिर का निर्माण पांडवों की ओर से अपने अज्ञातवास के दौरान किया गया था लेकिन इसको लेकर कोई प्रमाण मौजूद नहीं हैं। इस मंदिर की शैली बहुत ही भव्य है और देखने से यह मंदिर पत्थरों की निकासी पर बना हुआ नजर आता हैं। मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थरों से किया गया हैं। शिवधाम अत्यंत आकर्षक सरंचना व निर्माण कला के उत्कृष्ट नमूने के रूप में विद्यमान हैं। इस मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश एक डयोढ़ी से होता हैं जिसके सामने एक बड़ा वर्गाकार मंड़प बना हुआ हैं और उत्तर व दक्षिण दोनों तरफ बड़े छज्जे बने हैं । मंडप के अग्रभाग में चार स्तंभों पर टिका एक छोटा बरामदा हैं। बहुत सारे चित्र दीवार में नक्काशी करके बनाए गए हैं। मंदिर परिसर में प्रमुख मंदिर के अलावा कई और भी छोटे-छोटे मंदिर हैं जिनमें भगवान गणेश, माँ दुर्गा, राधाकृष्ण व भैरव की प्रतिमाएं विराजमान हैं।
शोभा यात्रा से होगी शिवरात्रि मेले की शुरुवात
महाशिवरात्रि पर बैजनाथ में पांच दिवसीय राज्य स्तरीय मेला 18 से 22 फरवरी 2023 तक पारंपरिक ढंग से मनाया जाएगा। इसमें शिवलिंग की पूजा अर्चना ओर शोभा यात्रा के साथ 18 फरवरी को मेला आरंभ होगा। इस पांच दिवसीय मेले में रात्रि को सिनेमा जगत के प्रसिद्ध कलाकारों के अतिरिक्त प्रदेश के विभिन्न जिलों से प्रसिद्ध कलाकारों की ओर से अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरा जाएगा । कमेटी की ओर स्व मेले में विशाल दंगल का आयोजन भी किया जाएगा जिसमें उत्तरी भारत के जाने माने पहलवान भाग लेंगे।
