चिंतपूर्णी/विकास शर्मा – कूड़ना पंचायत में जनसंवाद कार्यक्रम के तहत बुधवार को कैप्टन संजय ने कहा कि जसवां-परागपुर क्षेत्र में वोट बैंक की राजनीति के चलते पिछड़े क्षेत्र और पिछड़ते गए, लेेकिन न तो इन सुदूर गांवों में विकास की लौ पहुंच पाई। साथ मे इन ग्रामीण क्षेत्रों की किसी ने सुध भी नहीं ली। संजय ने कहा कि देश की आजादी के साढ़े सात दशक बीतने के बाद अगर ऐसे गांवों से दोयम दर्जे के व्यवहार हुआ है तो किसी न किसी को तो जिम्मेबारी लेनी ही होगी। अस्तित्व की जंग लड़ रहे ऐसे क्षेत्रों से साधन-संपन्न लोग तो पलायन कर गए, लेेकिन गरीब जनता को अब भी हर रोज दिक्कताें का सामना करना पड़ता है।
पराशर ने कहा कि कूड़ना पंचायत के खाला व पुखरू में आज तक संपर्क मार्गों का निर्माण नहीं हो पाया है। पंचायत के रांगा में दशकों बाद कच्ची सड़क तो बन गई, लेकिन बरसात के इस मौसम में गांव तक पहुंचना आसान नहीं है। इसी तरह की स्थिति सलेटी के साथ सटे कटाेह टिक्कर पंचायत के गांवों बलूणी व वासी की भी है। इन गांवों का कोई व्यक्ति बीमार हो जाए तो उसे सड़क तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को भारी मशक्कत का सामना करना पड़ता है। संजय ने कहा कि जसवां-परागपुर क्षेत्र के कई ऐसे गांव हैं, जोकि ढंग की सड़क या संपर्क रास्ते न होने के कारण अब तक दुर्गम बने हुए हैं।
हलेड़ पंचायत के रखारड़ा के वासियों के लिए बरसात का मौसम किसी आफत से कम नहीं होता है। मुख्य सड़क दुरंगई तक पहुंचने के लिए स्थानीय वासियों को बारिश के दिनों में नाकों चने चबाने पड़ते हैं। हलेड़ पंचायत के बैरी और चकोली में रास्तों की हालत बद से बदतर है। कैप्टन संजय ने कहा कि अलोह पंचायत के सरी गांव के हाल भी किसी से छिपे नहीं हुए हैं। इस गांव के लिए या तो ऊना की सीमा से होकर लंबा सफर तय करना पड़ता है और उबड़-खाबड़ सड़क होने से रास्ते पर वाहन चलाना किसी जोखिम से कम नहीं होता है, वहीं दूसरा रास्ता पंगडंडी को पार करने जाना पड़ता है। लाजिमी है कि बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों के लिए यह अव्यवस्था बेहद कष्ट देने वाली है। पराशर ने कहा कि रैल, उझे खास, टिप्परी, स्यूल और बठरा आदि पंचायतों में कई बस्तियां व गांव ऐसे हैं, जहां पर आज तक दिन तक एंबुलेंस रोड़ नहीं पहुंच पाया है।
एंबुलेंस रोड़ के लिए ऐसा नियम या कानून का प्रावधान होना चाहिए, जिससे कि आम आदमी को समय रहते चिकित्सा सहायता मिल सके। संजय ने कहा कि इन दूरदराज के गांवों में शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का भी सर्वथा अभाव रहा है, लेेकिन दुखद बात यह है कि इन ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाएं जुटाने के लिए जिस तरह के प्रयास करने चाहिए थे, वैसा जमीन पर होता नहीं दिखा। विडंबना यह भी है कि यह समस्याएं इन गांवों में नहीं हैं, लेकिन दशकों पुरानी गांववािसयों की परेशानी को किसी ने समझने का प्रयास नहीं किया। संजय ने कहा कि इन गांवों के लिए वह विजन के तहत कार्य करेंगे और हर दिक्कत का समाधान भी किया जाएगा।
