चन्द्रिका – हिमाचल प्रदेश के रामपुर बुशहर के सराहन में देवी भीमकाली का मन्दिर न सिर्फ श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक मन्दिर भी है । भीमाकाली मंदिर बुशहर राजवंश की कुलदेवी को समर्पित है ।
रामपुर बुशहर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर सराहन गांव को प्राचीन काल में शोणितपुर और बानसूर कि राजधानी के रूप में जाना जाता था। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 2000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। ये मन्दिर 51 शक्तिपीठों में से एक है । माना जाता है कि यहां पर माता सती का बाया कान गिरा था। इस मंदिर में विराजमान माता काली का रूप है और इसलिए ही इसे भीमकाली मंदिर के नाम से जाना जाता है।
माना जाता है कि बाली पुत्र बाणासुर इस क्षेत्र का शासक था। उसकी पुत्री उषा भगवान कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से, प्रत्यक्ष देखे बिना ही प्रेम करने लगी थी। उषा ने अनिरुद्ध को अपने स्वप्न में देखा था और तब से उसे अपने हृदय में बसा लिया था। उसने अपनी सखी चित्रलेखा को इस विषय में बताया। उषा द्वारा दी गयी जानकारी से सखी चित्रलेखा ने अनिरुद्ध का चित्र रेखांकित किया और अपनी सखी के लिए उसे खोजने निकल पड़ी। वह अनिरुद्ध को खोजकर उसे निद्रामग्न अवस्था में ही उठाकर सराहन ले आयी। यह ज्ञात होते ही श्रीकृष्ण जी ने बाणासुर से युद्ध की घोषणा कर दी। अंत में उषा एवं अनिरुद्ध का विवाह संपन्न हुआ। माना जाता है कि तब से निरंतर उन्ही के वंशज इस क्षेत्र में शासन करते आ रहे थे।
इस मंदिर का इतिहास लगभग 1000 से 2000 वर्ष पुराना
पहाड़ों से घिरा यह मंदिर काफी प्राचीन है। इस मंदिर का इतिहास लगभग 1000 से 2000 वर्ष पुराना बताया जाता हैं। यह मंदिर की खास बातों में से एक यह भी है कि इस मंदिर का निर्माण हिंदू और बौद्ध शैली में किया गया है।
