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कुल्लू दशहरा पर यह देवता ब्यास नदी नहीं करते पार, जानिए कैसे रघुनाथ के दरबार में भरते हैं हाजिरी

admin
admin 5 Min Read
Updated 2022/10/09 at 5:11 PM
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कुल्लू/मनमिन्द्र अरोड़ा: कुल्लू दशहरा में जहां सैकड़ों देवी-देवता भाग लेने के लिए कई किलोमीटर का पैदल सफर तय कर भगवान रघुनाथ से मिलने आते हैं। वहीं कुछ देवता ऐसे भी है, जो दशहरा में तो आते है लेकिन न तो वह उत्सव के पहले दिन होने वाली रथ यात्रा में भाग लेते है और ना ही आखिरी दिन होने वाले लंका दहन में मैदान में आते हैं। बता दें कि कुल्लू की घाटी के पांच ऐसे देवता भी है जो दशहरा उत्सव के लिए अपने मंदिर से ढालपुर की ओर तो रवाना होते हैं। लेकिन हर साल ब्यास नदी के दूसरे छोर पर वह 7 दिनों तक दशहरा उत्सव मनाते हैं।
नदी के दूसरे छोर पर अंगुली नामक स्थान पर देवता आजीवन नारायण सोयल, सरवन नाग सौर, शुकली नाग तांदला, जीव नारायण जाना और मलाणा के जमदग्नि ऋषि देवता शामिल है। देवता ब्यास के दूसरी ओर से ही दशहरा उत्सव की सभी परंपराओं का पालन कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार दशहरा उत्सव में देवता को नदी पार करके जाना पड़ता है। लेकिन यह देवता नदी पार नहीं करते हैं। ऐसे में देवता के साथ आए लोग दोपहर के समय दशहरा उत्सव देखने जाते हैं और शाम को देखकर वापस आते हैं। देवता आजीमल नारायण के कारदार केहर सिंह का कहना है कि वह बचपन से इसी परंपरा को निभाते आए हैं।

देवता हर साल यहीं से दशहरा मनाते हैं और बाकी सभी परंपराओं का भी पालन किया जाता है। यहां पर देवताओं के सिर्फ निशान लाए जाते हैं और देवता का रथ यहां पर नहीं आता है। जब तक दशहरा समाप्त नहीं होता तब तक यहां पर पांचों देवता विराजमान रहते हैं और श्रद्धालुओं को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। वहीं कुल्लू के मुख्यालय ढालपुर मैदान में जहां अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। ढालपुर मैदान में सालों पुरानी देव परंपरा का भी निर्वहन किया जा रहा है। यह परंपरा देवता के हारियानों द्वारा निभाई जा रही है और इस परंपरा को देखने के लिए देश-विदेश से भी सैलानी ढालपुर मैदान पहुंच रहे हैं।

यह परंपरा कई सालों पुरानी

भगवान रघुनाथ के छड़ी बरदार महेश्वर सिंह का कहना है कि यह परंपरा कई सालों पुरानी है। पहले मलाणा के लोग नदी के दूसरे किनारे खाना भी नहीं खा सकते थे। अब परंपरा में थोड़ा बदलाव हुआ है। लेकिन दशहरा उत्सव के दौरान यह देवता व्यास नदी के दूसरे किनारे पर ही रहते हैं और वहीं से ही सभी परंपराओं का निर्वाह किया जाता है। देवता के पुजारी चमन लाल का कहना है कि देवता दशहरा उत्सव के सभी परंपराओं का पालन यहीं से करते हैं और यहां पर श्रद्धालुओं की समस्या का भी देवता के द्वारा निपटारा किया जाता है। देवता के दर्शन को हिमाचल प्रदेश के कोने-कोने से लोग यहां पर पहुंचते हैं।

हरियान व श्रद्धालुओं के खाने-पीने की व्यवस्था करते है पुरोहित परिवार

पुजारी कुबेर गौड़ का कहना है कि यहां पर देवता के साथ आए हरियान व श्रद्धालुओं के खाने पीने की व्यवस्था भी पुरोहित परिवारों के द्वारा की जाती है। यहां पर 7 दिनों तक श्रद्धालु देवता के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं और सालों पुरानी परंपरा का पालन आज भी किया जा रहा है।

नदी पार ही निभाई जाती है सभी देव परंपरा

देवता के दर्शनों को पहुंचे श्रद्धालु सावित्री, मोनू का कहना है कि वह देवता के दर्शनों के लिए व्यास नदी के दूसरे किनारे पर पहुंचते हैं और दोपहर के समय दशहरा उत्सव का भी मजा लेते हैं। देवता की सभी रीति-रिवाजों का पालन व्यास नदी के दूसरे किनारे पर ही किया जाता है और सालों से यह परंपरा निभाई जा रही है।

TAGGED: Beas River, Kullu Dussehra, Raghunath
admin October 9, 2022
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