शिमला,संजु चौधरी(TSN)-14 मार्च को देशभर में होली का त्योहार मनाया जाना है.इसे लेकर लोगों में खासा उत्साह है.होली के त्योहार का ऐतिहासिक महत्व भी है.होली एक वैदिक यज्ञ है,जिसका मूल स्वरूप आज विस्मृत हो गया है. वैदिक काल में इसे’नवान्नेष्टि’ कहा जाता था.इस दिन खेत के अधपके अन्न का हवन कर प्रसाद बांटने का विधान है. इस अन्न को ‘होला’ कहा जाता है,इसलिए इसे होलिकोत्सव के रूप में मनाया जाता है.होली को नवसंवत्सर और वसंत के आगमन के उपलक्ष्य में किया हुआ यज्ञ भी माना जाता है.माना जाता है कि मनु का जन्म इसी दिन हुआ था.इसे मन्वादितिथि भी कहा जाता है. पुराणों के अनुसार,भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से यह त्योहार मनाने का प्रचलन हुआ.
होली के महत्व पर “होली- लोक आस्था और सांस्कृतिक एकता का महापर्व” नामक पुस्तक लिखने वाले प्रो. विवेकानंद तिवारी का कहना है कि प्राचीन संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है.वेदों विशेषकर ऋग्वेद और सामवेद में रंगों और ऋतुओं के महत्व का वर्णन मिलता है. श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह जिन घरों में रहने वाले परस्पर मधुर और शिष्ट संभाषण करते हैं, जिनमें सब तरह का सौभाग्य निवास करता है,जो प्रीति- भोजों से संयुक्त है,सभी हास और उल्लासमय जीवन-यापन करते हैं एवं जहां कोई भूखा-प्यासा नहीं,उन घरों में कहीं से भय का संचार न हो.हमारी संस्कृति मे ‘होली’का उत्सव तामसिक वृत्तियों के मुखर होने हेतु नियत किया गया है.इस दिन हमारी मर्यादित प्रकृति भी उन्मुक्त हो जाती है.आमोद-प्रमोद निर्बंध हो जाते हैं.उत्सव की इस सम्मोहनी शक्ति को हमारे द्रष्टा महर्षियों ने समझा था.
