भावना शर्मा: पहाड़ों की राजधानी शिमला जिसे ऐतिहासिक इमारतों का शहर भी कहा जाता हैं। इस शहर के ऐतिहासिक इमारतों में ही यहां का इतिहास बसता हैं। इन इमारतों में बसती हैं ब्रिटिश कालीन समय कि वह कहानियां जो आज भी लोगों के जहन में उस समय की यादें ताजा कर देती हैं। जब अंग्रेजों ने शिमला को अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया तो उन्होंने अपनी जरूरत ओर सहूलियत की सभी सेवाएं भी यहां पर शुरू की। उसी में से एक आवश्यक है सेवा थी डाक सेवा। इस डाक सेवा की खास बात यह है कि उस समय अंग्रेजों ने शिमला की जिस इमारत में अपना डाकघर शुरू किया था आज भी उसी भवन में शिमला जीपीओ का कार्यालय चल रहा हैं।
ब्रिटिश कालीन समय में जिस इमारत में अंग्रेजों में अपना डाकघर चलाया आज भी उसी इमारत में डाकघर चल रहा हैं, लेकिन अब जो बदला हैं वह हैं डाक को लाने और ले जाने का जरिया और नजरिया। चलिए आपको अब शिमला के स्कैंडल प्वाइंट पर स्थित शिमला जनरल पोस्ट ऑफिस के इस भवन से जुड़ा इतिहास भी बताते हैं। वर्तमान में धरोहर घोषित हो चुकी जीपीओ यानी जरनल पोस्ट ऑफिस की इमारत को डाकघर बनाने से पहले इस जगह पर ब्रिटिश कालीन समय में एक दर्जी की दुकान हुआ करती थी। इस इमारत को पहले कॉनी लॉज के नाम से जाना जाता था,लेकिन 1880 में डाक विभाग ने अंग्रेज पीटरसन से इस ऐतिहासिक भवन को खरीद लिया और उसके बाद 1883 में इस इमारत में डाकघर शुरू किया गया।
इस स्थान पर कभी यूरोपियन टेलर इंगल बर्ग एंड कंपनी की दर्जी की दुकान हुआ करती थी। मुख्य डाकघर की इस बिल्डिंग को पहले कॉनी लॉज के नाम से जाना जाता था। कपड़ों की सिलाई का काम बंद होने के बाद इसी इमारत में कुछ समय तक शिमला बैंक भी कार्यालय भी रहा, लेकिन बाद में इस इमारत को इसके मालिक पीटरसन से खरीद लिया गया। इसके बाद 1883 में यहां डाकघर खुला जिसमें विलायती डाक आया करती थी।
जब तक अंग्रेजों ने भारत पर राज किया तब तक इस भवन में अंग्रेजों का डाकघर चलता रहा लेकिन आजादी के बाद 1 जनवरी 1947 को इस भवन में चल रहे पोस्ट ऑफिस में एके हजारी ने बतौर पहले भारतीय पोस्ट मास्टर जिम्मा संभाला। तब से लेकर अब तक इस भवन में डाक विभाग का कार्यालय ही चल रहा हैं और इसकी व्यवस्था में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया गया। 1992 में इस इमारत को हेरिटेज का दर्जा दिया गया हैं। शुरूआत से लेकर अब तक, जीपीओ ने चिट्ठियों को ई-मेल में बदलते हुए सब कुछ देखा हैं।
शिमला में ब्रिटिश कालीन समय में अंग्रेजों ने जब इस भवन में अपना डाकघर बनाया था तो उस समय दांत को लाने और ले जाने के लिए संसाधन बेहद कम थे ऐसे में डाक घोड़ों की मदद से तांगे पर कालका से शिमला लाई जाती थी। कालका से शिमला तक तीन बार तांगे के घोड़े बदले जाते थे। बड़ोग व क्यारी इसके स्टेशन थे, जहां कालका से चल रहे घोड़ों को बड़ोग और बड़ोग से चले घोड़ों को आराम देने के लिए क्यारी जगह पर बदला जाता था, जहां एक डाक बंगला भी था। इतना ही नहीं उस दौर के वायसराय भी रिक्शा मेल के आने पर उसे रास्ता देते थे। ग्रीष्मकालीन राजधानी होने के चलते शिमला राजनीति का मुख्य केंद्र था कई गोपनीय पत्र भी डाक विभाग के माध्यम से वितरित होते थे। इसके बाद जब अंग्रेजों ने शिमला तक रेल सेवा पहुंचाई तो उसके बाद कालका से शिमला तक डाक तांगे पर ना लाकर रेल मार्ग से लाई जाने लगी।
ब्रिटिश काल में झंडा लहरा कर दी जाती थी डाक आने की सूचना
ब्रिटिश काल में जब शिमला जीपीओ में विलायती डाक आती थी तो डाक घर पर लाल झंडा लहरा कर और घंटी बजाकर इसके बारे में जानकारी दी जाती थी।इससे संकेत मिलता था कि डाक आ गई है और ब्रिटिश अफसर अपने नौकरों को यहां भेज कर अपनी डाक मंगवा लेते थे। डाक से केवल चिठ्ठी ही नहीं आती थी बल्कि मैग्जीन, अखबार, कपड़े व अन्य आवश्यक चीजें भी इसके माध्यम से शिमला पहुंचती थी इतना ही नहीं जब डाक आती थी तो उसे रात में ही लालटेन की रोशनी में पोस्टमैन बांटते थे ओर रविवार की छुट्टी तक भी इन कर्मचारियों को नहीं मिलती थी।
जीपीओ भवन की निर्माण शैली भी हैं खास
जीपीओ इमारत का इतिहास जितना रोचक है उतनी ही रोचक इस भवन की निर्माण शैली भी हैं। इस भवन का निर्माण जो शैली में किया गया है वह इस तरह की है कि यह इमारत बड़े से बड़े भूकंप के झटकों को सहने की क्षमता रखती हैं। 3 मंजिल की इस इमारत में लकड़ी के 6 हॉलो पिल्लर लगाए गए हैं। ब्रिटिश काल में इमारत के बेसमेंट में एक चिमनी में आग जलाई जाती थी, जिससे पूरी इमारत के कमरे गरम रहते थे। वर्तमान में यह चौड़े पिल्लर तो हैं, लेकिन चिमनी को बंद कर दिया गया।
1972 में इस ऐतिहासिक भवन में लग गई थी आग
जीपीओ की यह बिल्डिंग 1972 में आग की भेंट भी चढ़ी थी। उस समय स्टाफ के लोगों ने खिड़कियों से जरूरी दस्तावेज, फाइल और कैश बॉक्स बाहर फेंक दिए थे, जिसके बाद जहां-जहां नुकसान हुआ उसकी मरम्मत कर दी गई है और भवन को उसी पुरानी शैली में तैयार किया गया।
