चन्द्रिका : हिमाचल का चम्बा रुमाल पहाड़ी चित्रकला का बेहतरीन उद्धरण है। चम्बा रुमाल देश और विदेश में काफी विख्यात है । हिमाचल प्रदेश के जिला चम्बा से इस रुमाल को विशेष तौर पर बनाया जाता है, जहां से इसकी शुरुआत हुई।
16वीं शताब्दी में गुरु नानक की बहन बेबे नानकी ने इसे बनाया
चम्बा रुमाल का प्रचलन 17वीं शताब्दी में शुरू हुआ था। इस रुमाल पर कढ़ाई कर चम्बा की रानियों और शाही महिलाओं द्वारा शादी के दहेज, महत्वपूर्ण उपहारों और औपचारिक आवरणों के लिए दिया जाता था। हालांकि इस रुमाल का सबसे प्रारंभिक रूप 16वीं शताब्दी में गुरु नानक की बहन बेबे नानकी द्वारा बनाया गया था, जो अब होशियारपुर के गुरुद्वारा में संरक्षित है । विक्टोरिया अल्बर्ट संग्रहालय, लंदन में एक रूमाल है जो 1883 में राजा गोपाल सिंह द्वारा अंग्रेजों को उपहार में दिया गया था और इसमें महाकाव्य महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध का एक कशीदाकारी दृश्य है ।
रुमाल पर पौराणिक विषयों के दृश्यों को जाता है उकेरा
चम्बा रुमाल में एक अलग कहानी चित्रित की जाती है, जिसके कारण इस कला में विविधता देखने को मिलती है। आकार में बड़े होने के कारण ये रुमाल दीवारों पर वॉल पेंटिंग की तरह सजाए जाते हैं। चम्बा रुमाल लोकप्रिय कशीदाकारी हस्तकला है, जिसे ‘नीडल पेंटिंग’ के नाम से भी जाना जाता है। चम्बा रुमाल रेशम एवं सूती कपड़े पर दोनों ओर समान कढ़ाई कर तैयार किया जाता है। इन रुमालों पर प्रचलित कहानियों, परंपराओं व पौराणिक विषयों के दृश्यों को उकेरा जाता है। इसके अलावा कृष्ण, रामायण, महाभारत और पुराण के कहानियों, नायक-नायिकाओं के प्यार के किस्सों व राग-रागिनी जैसे विषय पर भी चम्बा रुमाल तैयार किया जाता है।
शादी समारोह में आज भी देने की परम्परा
चम्बा रुमाल आज भी प्रचलन है। चम्बा के शादी समारोह में आज भी चम्बा रुमाल को बतौर उपहार दिया जाता है। इस रुमाल को तैयार करने में दो सप्ताह से दो महीने का समय लग जाता है।
