संजु चौधरी, शिमला: शिमला के रिज मैदान पर स्थित ऐतिहासिक क्राइस्ट चर्च में एक बार फिर से 150 साल पुरानी वार्निंग बेल सुनाई देगी। तकरीबन 40 साल के बाद इस बेल को क्राइस्ट चर्च में बजाया जाएगा। हालांकि वर्ष 2019 में भी इस वार्निंग बेल को ठीक करवाया गया था। इसके बाद कोविड के चलते क्रिसमस का जश्न ल नहीं मनाया गया और यह बेल भी चर्च में नहीं बज पाई, जिस वजह से यह बेल एक बार फिर से खराब हो गई थी। इस बार इस बेल को क्रिसमस से पहले ही रिपेयर करवा लिया गया है, जिससे इस बार क्रिसमस के ऊपर शहर वासियों को वार्निंग बेल की धुन एक बार फिर से अपने कानों में गूंजती हुई सुनाई देगी।
क्रिसमस पर होने वाली प्रार्थना सभाओं से पहले चर्च में इस बेल को बजाया जाएगा, जिससे प्रार्थना सभा शुरू होने की सूचना सब लोगों तक पहुंचाई जाएगी। यह बेल ब्रिटिश कालीन समय में क्राइस्ट चर्च में प्रार्थना के लिए 150 साल पहले इंग्लैंड से लाई गई थी। इस वार्निंग बेल या कॉल बेल का भी अपना ही महत्व था और इसे प्रार्थना से पहले बजाया जाता है। अंग्रेजों के समय में इस बेल की आवाज पूरे शहर में गूंजती थी, जिससे इस बात की जानकारी मिल जाती थी कि चर्च में प्रार्थना सभा शुरू होने वाली है। इसी की आवाज सुनकर अंग्रेज अपने घरों से चर्च की ओर निकलते थे और प्रार्थना सभा में भाग लेते थे।

समय बीतता गया और इस बेल की आवाज भी तकनीकी खामियों के चलते पूरी तरह से बंद हो गई थी, लेकिन इसके बाद वर्ष 2019 में शिमला के ही एक कारीगर ने इस बेल को ठीक कर दिखाया। बावजूद इसके भी यह बेल ज्यादा दिनों तक ठीक नहीं रह पाए और फिर से खराब हो गई लेकिन अब एक बार फिर से इस बेल को ठीक कर लिया गया हैं। यह बेल कोई साधरण बेल नहीं बल्कि मैटल से बने छह बड़े पाइप के हिस्से से बनी है। इस बेल के बजते ही इन पाइप पर संगीत के सात सुर की ध्वनि आती है। इन पाइप पर हथौड़े से आवाज होती है, जिसे रस्सी खींचकर बजाया जाता है। यह रस्सी मशीन से नहीं, बल्कि हाथ से खींचकर बजाई जाती है। हर रविवार सुबह 11 बजे होने वाली प्रार्थना से पांच मिनट पहले यह बेल बजाई जाती है, जिसे सुनकर लोग प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए आते हैं।
ब्रिटिश कालीन समय में जब क्राइस्ट चर्च में इस बेल को बजाया जाता था तो इसकी आवाज शिमला शहर में तो गूंजती ही थी लेकिन यह आवाज तारा देवी तक सुनाई देती थी। अब समय के साथ यह बेल ठीक तो हो गई है लेकिन इसकी आवाज में वह दम नहीं रहा है। अब इसकी आवाज रिज मैदान के आसपास के एरिया में है सुनाई देती है। चर्च के पादरी सोहन लाल ने बताया कि ब्रिटिश काल के समय अंग्रेजों के आवास शिमला शहर में अलग-अलग स्थानों पर होते थे।
बेल के माध्यम से उन्हें सूचित किया जाता था कि प्रार्थना शुरू होने वाली है। ब्रिटिश काल में मोबाइल फोन नहीं थे, इसलिए किसी दुखद घटना और आपातकाल की सूचना देने के लिए भी कॉल बेल का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन जब किसी हादसे या दुःखद घटना की सूचना देने के लिए इस बेल को बजाया जाता था तो उसकी ध्वनि अलग होती थी। बता दें कि 9 सितंबर 1844 में इस क्राइस्ट चर्च की नींव कोलकाता के बिशप डेनियल विल्सन ने रखी थी। 1857 में इसका काम पूरा हो गया था। स्थापना के 25 साल बाद इंग्लैंड से इस बेल को शिमला लाया गया था। 1982 में यह बेल खराब हो गई थी, जिसे 40 साल बाद अब दोबारा ठीक करवाया गया हैं।
