भावना शर्मा: शिमला जिसे ऐतिहासिक इमारतों का शहर भी कहा जाता हैं। यहां ब्रिटिश काल की अनेक ऐतिहासिक इमारतें हैं इन्ही में से एक हैं शिमला के रिज़ मैदान की शान को बढ़ाने वाला उत्तर भारत का दूसरा सबसे पुराना क्राइस्ट चर्च। यह ऐतिहासिक चर्च ब्रिटिश काल की ही शिमला को दी गईं खूबसूरत और नायाब देन हैं जो आज भी पयर्टक नगरी शिमला आने वाले पर्यटकों की पहली पसंद हैं।शिमला आने वाले हर पर्यटक फिर चाहे वो बाहरी राज्यों से हो या विदेशी हर पर्यटक इस चर्च को देखने के लिए उत्सुक रहता हैं।
शिमला के क्राइस्ट चर्च की सबसे खास बात हैं कि यह नियो गौथिक शैली में बनाया गया है। चर्च एंग्लीकेन ब्रिटिशन कम्युनिटी के लिए इसे बनाया गया था जिसे उस समय सिमला कहते थे। बाद में इसका नाम शिमला पड़ गया।
यह हैं चर्च का इतिहास
क्राइस्ट चर्च का नींव पत्थर 9 सितंबर 1844 को रखा गया और 10 जनवरी 1857 यानी 13 सालो में यह पूरी तरह से बनकर तैयार हो गया था। हालांकि अक्टूबर 1846 को इसे प्रार्थना के लिए खोला गया। उस समय चर्च में बैठने का कोई प्रावधान ना होने के चलते यहां खड़े होकर ही प्रेयर करनी पड़ती थी। 1847 में लोगों को प्रेयर करने या बैठने के लिए अपने घरों से चेयर लेकर आने को कहा गया था। मेसर्स बर्लिसन ने इस चर्च का डिजाइन बनाया था और मेजर थर्नबर्न और एलएफ रॉबर्टसन की देखरेख में चर्च के निर्माण का सारा काम हुआ था। उस समय चर्च की लागत करीब 40 से 50 हजार रुपये आई। ब्रिटिश सरकार ने इसके लिए 12 हजार रुपये दिए, जबकि बाकी पैसा निजी स्त्रोतों के जरिए इकट्ठा किया गया।
ऐतिहासिक दृष्टि से इस चर्च में एक नहीं अनेक खासियतें हैं। चर्च जिस शैली में बनकर तैयार हुआ हैं वो तो अपने आप में ही एक नायाब शैली हैं लेकिन इस चर्च की दीवारों पर बनाई गई पांच बड़ी खिड़कियों में लगे शीशे भी बेहद खास हैं। ये खिड़कियां रोशनी के लिए इस चर्च में नहीं बल्कि ईसाई धर्म के विश्वास, उम्मीद, परोपकार, धैर्य, विनम्रता का प्रतीक है। इनमें लगे शीशे को 1890 में लंदन से लाया गया था। चर्च के अंदर चार तरह की घंटियां भी लगी हैं जो इस समय तो बजने की हालत में नहीं है लेकिन ये चार तरह की घंटियां चार विशेष मौके पर बजाई जाती थी। इसमें से एक घंटी क्रिसमस, एक न्यू ईयर, एक ईस्टर ओर एक गुड फ्राइडे पर बजाई जाती थी लेकिन कई अरसे से खराब पड़ी इस घंटियों की आवाज अब इस चर्च में नहीं गूंजती हैं।
इस चर्च को वैसे तो बंद ही रखा जाता हैं लेकिन रविवार को पर्यटकों के लिए इसे विशेष रूप से खोला जाता हैं। रविवार को ही विशेष प्रार्थना चर्च में आयोजित की जाती हैं। इसमें ईसाई समुदाय के लोगों के साथ ही अन्य लोग भी भाग लेते हैं।
दूर से देखने पर दिखाई देता हैं चर्च की छत पर बना ताज
शिमला के ऐतिहासिक रिज़ मैदान पर स्थित यह क्राइस्ट चर्च शिमला में प्रवेश करने पर रिज़ मैदान से कई किलोमीटर दूर से ही दिखाई पड़ता हैं। इस चर्च की छत कई किलोमीटर दूर से देखने पर एक ताज की तरह दिखाई देती हैं। इसकी छत को ताजनुमा आकार में बनाया गया हैं यही वजह भी हैं कि इसे रिज़ मैदान का ताज भी कहा जाता हैं।
चर्च पर लगी घड़ी का भी हैं अपना ही इतिहास
चर्च के ऊपर एक बड़ी घड़ी लगाई गई हैं जो सामान्य घड़ियों से बिल्कुल अलग हैं। यह घड़ी 1860 में कर्नल डमबेल्टन ने दान की थी। तब से लेकर आज तक यह घड़ी चर्च के ऊपर लगी हैं।
मेरठ के सेंट जोन चर्च के बाद आता हैं क्राइस्ट चर्च शिमला
शिमला के रिज़ मैदान पर बना क्राइस्ट चर्च उत्तरी भारत का दूसरा सबसे पुराना चर्च है। इससे पुराना चर्च मेरठ का सेंट जोन चर्च हैं । ये चर्च उत्तर भारत का सबसे पुराना चर्च है जिसका निर्माण 1819 से 1821 के दौरान हुआ था।
